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शनिवार, 9 जनवरी 2016

नमस्कार, वाणकम्म, सुस्वागतम, खुस आमदीद, सतश्री अकाल, WELCOME ॰


                       श्री वक्रतुंड  महाकाय  ।  सूर्य कोटी संप्रभ:॥
                    निर्विघ्नम् कुरु मे देव । सर्व कार्येषु सर्वदा ॥ 

नमस्कार, वाणकम्म, सुस्वागतम, खुस आमदीद, सतश्री अकाल, WELCOME। 

सारांश के इस प्रथम ब्लाग पोस्ट के प्रकाशन के शुभ अवसर पर आप सभी मित्रों, अभिभावकों एवं शुभचिंतकों का हार्दिक स्वागत । बहुत दिनों से मेरी एक इच्छा थी कि मैं भी अपने अन्य मित्रों एवं लेखकों की तरह, अपने खुद का एक ब्लाग बनाऊँ तथा अपनी रचनाएँ इस ब्लाग के माध्यम से आप तक पहुंचाऊं। पर समस्या यह थी कि इंटरनेट पर हिन्दी में लिखना तब इतना सरल नहीं था। हिन्दी का फॉन्ट डाउन्लोड कीजिये, फिर हिन्दी वर्णमाला का की बोर्ड अंग्रेजी के की बोर्ड अनुसार याद कीजिये, मतलब कि झंझट ही झंझट। पर अब ऐसा नहीं। हिन्दी मे टाईप करना अब काफी सरल हो गया है। अँग्रेजी के की बोर्ड से ही अब आप हिन्दी मे टाईप कर सकते हैं। गूगल एवं माइक्रोसॉफ्ट वालों ने इसे काफी आसान बना दिया है। हिन्दी के शब्द आप अँग्रेजी लिपि में टाइप कीजिये, वह अपने आप हिन्दी लिपि मे परिवर्तित हो जाएगा।

दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न यह था कि इस ब्लाग का नाम क्या रक्खा जाए । बहुत सोंच विचार के बाद मैंने इसका नाम रक्खा है "सारांश"। एक व्यक्ति अपने जीवन में जो जीता है, अनुभव करता है , वही वह अपने साहित्य में देता है। इस अर्थ में एक व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन के अनुभवों का निचोड़ है "सारांश", जो प्रतिबिम्बित होता है उसकी रचनाओं में। दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि एक व्यक्ति का साहित्य और कुछ नहीं बल्कि "सारांश" है उस साहित्यकार का । इस नाम को चुनने के पीछे हो सकता है शायद मेरे अन्तर्मन मे भी कहीं यही आकॉक्षा रही हो कि मैं भी अपने जीवन का सारांश अपनी रचनाओं के माध्यम से देने का प्रयास करूँ।

ब्लाग लेखन का मेरा यह पहला ही अनुभव है, अत: अनुभवी मित्रों से मेरा यह आग्रह है कि कृपया जहां भी कोई त्रुटि नजर आए या सुधार की आवश्यकता महसूस हो, अपना बहुमूल्य मार्ग दर्शन अवश्य प्रदान करें। कृपया यह भी बताएं कि रचनाओं का स्तर क्या है, आपको कैसी लगी ताकि भविष्य में मैं इनमें वांछित सुधार ला सकूँ। आपके आशीर्वचनों की प्रतिक्षा रहेगी।
                                                                                                                     


       

रविवार, 20 सितंबर 2015

गुरु मंत्र

               विद्या हीं समृद्धि एवं सुख का द्वार है   


Sanskrit literature is a treasure house of such ancient wisdom which ignites the minds of human beings and guides them towards how to achieve their goal. Here is a guru mantra on what is the secret of removing poverty and how to achieve wealth and happiness in life.            

                        

                         


                                      विद्या ददाति विनयम् ,   विनयाद्याति पात्रताम्   । 
                                     पात्रत्वाम्  धनमाप्नोती,   धनात् धर्मम् तत: सुखम्  ।। 
                                                                                                  
Education, learning, and/or knowledge makes a person humble, courteous॰ Humility provides him ability and opportunity to earn. Ability to earn leads him to riches and wealth. From wealth to dharma and then to happiness and a fruitful life , this is how a person reaches to his ultimate goal. 

विद्या हमें विनम्रता प्रदान करती है। विनम्रता से हममें सीखने की क्षमता, पात्रता का विकास होता है। और एक बार जब पात्रता आ जाती है तब फिर लक्ष्मी भी दूर नहीं रहतीं। अर्थात पात्रता से धन की प्राप्ति होती है। पर क्या एक बार जब धन की प्राप्ति हो गयी तो उसीसे सुख की प्राप्ति हो जाएगी? इस प्रश्न का उत्तर बड़ा दिलचस्प है। सूत्र कहता है कि धन से धर्म तथा धर्म से सुख की प्राप्ति होती है। अर्थात मात्र धन प्राप्त हो जाने से सुख भी चला आएगा, ऐसा नहीं है। सुख की प्राप्ति का रास्ता है धार्मिक आचरण। 

                                                       
                               
  • उपरोक्त सूत्र कई तरह के प्रश्न उठाते हैं। सबसे पहले विद्या क्या है ?   क्या शिक्षा (Education) विद्या है ? अवश्य हीं शिक्षा विद्या का एक सबसे बड़ा माध्यम है। ज्ञान (Knowledge), लिखना (Writing), पढ़ना (Reading), सीखना (Learning), निपुणता (Skill), चेतना (Awareness), विवेक (Wisdom), निर्णायक क्षमता (Ability to judge) इन सारी चीजों का सम्मिलित रूप है विद्या; और इस में किसी को कोई शक नहीं होनी चाहिए कि इन सारी चीजों को प्राप्त करने का सबसे बड़ा माध्यम है शिक्षा । एक व्यक्ति कि बुद्धि (Intelligence) कम ज्यादा हो सकती है पर शिक्षा एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा एक कम बुद्धि का व्यक्ति भी अपने क्षेत्र में निपुणता प्राप्त कर सकता है क्योंकि उसकी बुद्धि एक क्षेत्र मे भले कम हो पर दूसरे क्षेत्र में ज्यादा हो सकती है।   


  • दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न है - विनय क्या है ? क्या विनय का मतलब विनम्रता से है? उत्तर है - हाँ । विनय का मतलब है, मर्यादित आचरण, शिष्टता, शालीनता, सभ्यता एवं सबसे महात्वुर्ण बात ये जिसमें अहंकार न हो, जो अपनी बात थोपने की बजाय दूसरों की बातें ध्यान से विनम्रता पूर्वक सुनने की क्षमता रखता हो। तो क्या विद्या विनम्रता प्रदान करती है ? उत्तर है - हाँ भी और ना भी । कहते है विद्या अर्थात ज्ञान से परिपूर्ण व्यक्ति सागर की तरह धीर, गंभीर एवं विनम्र हो जाता है । दूसरी तरफ एक और कहावत है - " अध जल गगरी छलकत जाए" । अर्थात जिस घड़े मे पानी कम होता है वो ज्यादा छलकता है । स्पष्ट है विद्या एक व्यक्ति को विनम्र भी बना सकता है और अहंकारी (Arrogant) भी । कम या ज्यादा शिक्षित, दोनों ही तरह का व्यक्ति विनम्र या अहंकारी हो सकता है । ज़्यादातर यह निर्भर करता है व्यक्ति के पालन पोषण एवं उसे प्रदत्त संस्कारों पर । अन्य कारण भी हो सकते हैं । पर कारण जो भी हो, इतना तो तय है कि यदि व्यक्ति में अहंकार आ गया तो वह अपनी सीखने कि क्षमता खो देता है। सीखना एक सतत प्रक्रिया है। अहंकार इस सीखने कि क्षमता का हरण कर लेता है। दूसरी तरफ यदि उसमें विनम्रता आती है तो अवश्य ही उस व्यक्ति में सीखने की क्षमता तथा उस क्षमता का प्रयोग कर धन कमाने की उसकी पात्रता कई गुना बढ़ जाएगी। 


  • तीसरा महत्वपूर्ण प्रश्न - पात्रता क्या है ?  क्या पात्रता का तात्पर्य धन कमाने की योग्यता से है ?   उत्तर है - हाँ । पात्रता का अर्थ है योग्यता । विद्या विनम्रता प्रदान करती है तथा एक विनम्र व्यक्ति धन कमाने की योग्यता ज्यादा अच्छी तरह हासिल कर सकता है। इस विंदु पर विद्या, विनम्रता एवं पात्रता अर्थात योग्यता तीनों ही एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं। अर्थ शास्त्र कहता है कि इस दुनिया में जितने भी सक्षम लोग किसी न किसी कार्य में कार्यरत हैं, उनका मूल उद्देश्य धन कमाना ही है, क्योंकि धन ही वो माध्यम है जिसके द्वारा वे अपनी आवश्यकताओं कि पूर्ति कर सकते हैं। कहना न होगा कि धन कमाने की योयता या पात्रता का कितना बड़ा महत्व है। 


                                                       
                                                               




  • अब आते हैं अगले प्रश्न पर जो संबन्धित है - धन प्राप्ति से । क्या पात्रता या योग्यता आजाने मात्र से धन की प्राप्ति हो जाएगी ? उत्तर है - नहीं । समाज में ऐसे व्यक्तियों कि कमी नहीं जो बहुत ही ज्यादा पढे लिखे, बहुत विद्वान हैं, फिर भी उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं। इसका उत्तर ये है कि सिर्फ योग्यता प्राप्त कर लेना ही काफी नहीं, जब तक प्राप्त योग्यता को योग्यता अनुरूप काम मे उपयोग न किया जाए, धन की प्राप्ति नहीं हो सकती। पर जिस व्यक्ति के पास पात्रता ही नहीं है, उसके द्वार लक्ष्मी कैसे आ सकती हैं ? मैं ऐसे कई व्यक्तियों को जनता हूँ जो मात्र शिक्षा (विद्या) के बल पर, न सिर्फ अपना बल्कि अपने पूरे परिवार को झोपड़पट्टी से निकालकर आर्थिक संपन्नता की नई ऊंचाइयों पर ले जाने में सक्षम हुए हैं। सच पुछो तो गरीबी से लड़ने का सबसे धारदार हथियार है - विद्या । विद्या ही समृद्धि का द्वार है ।  

  • अगला प्रश्न है - धर्म क्या है ? धन से धर्म ऐसा क्यों कहा गया है ? यहाँ मैं धर्म क्या है इस पर किसी लंबे चौड़े बहस मे नहीं पड़ना चाहता, क्योकि इस विषय पर हजारों हजार पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं और आगे भी लिखी जाती रहेंगी। बस इतना कहना चाहता हूँ कि हरेक धर्म में, चाहे वो हिन्दू धर्म हो या इस्लाम या क्रिश्चियन, कुछ बातें समान हैं। जैसे - हर इंसान ईश्वर का ही प्रतिरूप है, अत: हरेक इंसान से प्यार करो, गरीबों की मदद करो, जहां तक बन सके दुखी, लाचार, रोगग्रस्त, पीड़ितों की सेवा करो, धर्म अनुरूप आचरण करो आदि आदि । किसी लाचार, पीड़ित या गरीब की मदद करने पर जो एक आंतरिक संतोष या सुख प्राप्त होता है, वह अवर्णणीय है, इसे मदद करने के बाद प्राप्त होने वाली अनुभूति के द्वारा ही जाना जा सकता है । मदद तीन तरह से की जा सकती है। या तो शरीर से या धन से या शरीर और धन दोनों से। हर व्यक्ति को ईश्वर का प्रतिरूप समझना, जो लोग आर्थिक या शारीरिक कष्ट में हों तो उनकी मदद करना यदि धर्म है, तो निश्चय हीं धन का रोल सहायता करने की इस पूरी प्रक्रिया में बहुत हीं महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि एक व्यक्ति के पास यदि धन नहीं है तो आर्थिक कष्ट में पड़े एक दूसरे व्यक्ति की मदद वह कैसे करेगा ? इसीलिए लगभग सभी धर्मों में अपनी आय का कुछ हिस्सा गरीबों में दान करने, समाज के दबे कुचलों की सहायता करने का मार्ग सुझाया गया है ।" धनात् धर्मम् " का परिप्रेक्ष्य यही है । अवश्य ही धन से धर्म की प्राप्ति की जा सकती है। 

  • अब आते हैं इस प्रश्न पर की सुख क्या है ? क्या धन से सुख की प्राप्ति होती है ? सुख क्या है - इसकी व्याख्या करना थोड़ा जटिल तो है पर मोटे तौर पर हम यह कह सकते हैं कि सुख एक ऐसे मानसिक अवस्था का नाम है जिसमे व्यक्ति हंसी, खुसी, आनंद, सौभाग्य, कल्याण, आत्मिक संतुष्टि जैसे भावों की अनुभूति करता है । यह बात सही है की मात्र धन प्राप्त कर लेने से व्यक्ति सुखी हो जाएगा ऐसा नहीं है क्योंकि सुख प्राप्ति का स्रोत मात्र धन नहीं है। धन के अलावा भी ऐसी बहुत सारी चीजें हैं, जो उसे सुखी बनाती हैं । किसी व्यक्ति ने कोई परीक्षा प्रथम श्रेणी मे पास कर लिया, किसी रोड पर पड़े लाचार व्यक्ति की सहायता कर दिया, किसी को बेटे की चाहत है और बेटा हो गया, किसी की बेटी ने सारे लड़कों को पीछे छोड़ टेनिस में अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार जीत लिया, किसी डूबते व्यक्ति को किसी पुलिस के जवान ने बचा लिया - ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जिनसे सुख के भाव की अनुभूति होती है। एक दूसरे की मदद करना, अपने मेहनत के बल कुछ प्राप्त कर लेना, अपने बच्चों, परिवार या समाज के लिए कुछ त्याग करना आदि ऐसे कई कार्य हैं, जिनमें धन की आवश्यकता नहीं होती, फिरभी ऐसा कर लेने पर एक आत्मिक संतुष्टि, एक आंतरिक सुख की अनुभूति होती है।  
  • पर दूसरी ओर यह भी सत्य है कि धन सुख की प्राप्ति का एक बहुत बड़ा साधन है। धन की महत्ता इसलिए है क्योंकि यही वह माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य अपनी सारी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। रोटी, कपड़ा, मकान से लेकर गाड़ी, बंगला और आसमान में उड़ान तक बिना धन के नहीं हो सकता। धन आपके  छोटे छोटे सपनों, जैसे अच्छा खाना, अच्छा पहनना, अपना एक घर हो, अपनी एक गाड़ी नहीं तो कम से कम एक मोटर साइकिल हो, और ना जाने कितने ही ऐसे छोटे छोटे सपनों को वास्तविकता की धरातल पर उतारकर, उन सपनों को खुसियों मे परिवर्तित करने की क्षमता रखता है। अत: इसमें कोई दो राय नहीं कि धन से सुख की प्राप्ति होती है।  

सारांश : 
दुनिया में ऐसे लाखों गरीब हैं जिन्हें दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं । ऐसे लाखों करोड़ो लोग, जो गरीबी से जूझ रहे हैं, उनकी मुक्ति का एक मात्र मार्ग है - शिक्षा, क्योंकि इसी मार्ग से वे धन प्राप्ति के द्वार तक पहुँच सकते हैं। इतिहास गवाह है की जो राष्ट्र लक्ष्मी अर्थात् धन की आराधना नहीं करते, धन कमाने को हीन भावना से देखते हैं, वे राष्ट्र कभी विकास की उचाइयों को छू नहीं पाते। अत: लक्ष्मी की आराधना आवश्यक है । पर ध्यान रहे लक्ष्मी तक पहुंचने का रास्ता विद्या की देवी माँ सरस्वती के दरवाजे से शुरू होती है । सरस्वती की आराधना के बिना लक्ष्मी तक पहुंचना अत्यंत कठिन है । विद्या का तात्पर्य सिर्फ साहित्य, दर्शन, कला, विज्ञान, वाणिज्य, तकनीक आदि का किताबी ज्ञान नहीं है । इनमें निपुणता के अलावा अपने पेशा या कर्म से संबन्धित हर तरह की जानकारी प्राप्त करना, विभिन्न विषयों की सूचनाएँ, सामान्य ज्ञान, व्यावहारिक बुद्धि आदि भी विद्या के हीं अविभाज्य अंग हैं। इनमें से कौन सी सूचना या ज्ञान कब किस तरह लाभ पहुंचा दे, कोई नहीं जनता । अत: अपने दिमाग की खिड़की एवं दरवाजे हर वक्त खुली रक्खें, ज्ञान तथा सूचनाओं की तरंगें जो हर वक्त प्रवाहित होती रहती हैं, उन्हें लौटने ना दें, आगे बढ़कर  ग्रहण करें । यही है विद्या की देवी की सच्ची आराधना । गरीबी से मुक्ति का मार्ग भी यही है ।
                                              विद्या ही समृद्धि एवं सुख दोनों का द्वार है । 

                                                                                                                                              ***