कविता
कल हीं की बात है
-- जगदीश प्र. गुप्ता
मेरे प्यारे बेटे ,
तुम्हारा ये जन्म दिन
जाने क्यों ले चला है मुझे
आज फिर ,
यादों की उन सुनहरी गलियों मे जहां
तुम मिले थे हमे
दुनिया की सभी चाहतों से बढ़कर
ईश्वर के एक खूबसूरत वरदान की तरह ।
सूरज तो निकलता है रोज हीं
पर जाने क्या बात थी उस सुबह में
एक अजीब सा एहसास, रहस्य, खामोशी
जैसे कुछ कहने को हो बेताब कानों में ।
बीतते हर पलों के साथ हीं
बढ़ता रहा एक भय , एक बेचैनी
हर ओर एक अफरातफरी , भागते कदम
कानों में गूँजते हैं आज भी
वो फुसफुसाते स्वर , बेरहम ।
वेदना के वे मरमान्तक क्षण
उड़ेलते हैं आज भी कानों में अग्नि-कण
सांसें चलती तो थी पर , सहमी सहमी
हवाएँ भी थीं कुछ बेदम , रुकी रुकी
सृष्टि का वो सबसे पहला शब्द , क्यां क्यां
तभी नैपथ्य से उठा एक नाद स्वर
हृदय के तारों पर छेड़ता एक राग मधुर
सृष्टि का वो सबसे पहला शब्द , क्यां क्यां
धरा के गर्भ से ज्यों फूटता है , अंकुर नया
एक झटके में अचानक , सब कुछ बादल गया
सांसें जो थीं खामोश , रुकी रुकी
फिर से मचल पड़ीं ;
घड़ी घण्ट के ताल पर
हवाएँ थिरक उठीं ।
पहन घुँघरू पावों में अपनी
खुशियाँ यूं नाचीं ,
सारा अंबर झूम उठा ।
बधाई हो , बेटा हुआ है
और इस तरह तुम आए
बधाइयों के बीच
अपनी माँ के आँचल में ।
काली काली आँखें , अधखिली नन्ही सी
भुला नहीं हूँ मैं , आज भी
वो पहली कोशिश , पहचानने की ।
वो पहली कोशिश , पहचानने की ।
मेरे प्यारे बेटे ,
आज तुम बड़े हो चुके हो
दुनिया के समर मे खड़े हो चुके हो
फिर भी लगता है जैसे ,
कल हीं की बात हो ।
उठे ये हांथ हमारे
मांगती हैं दुआएं
हर वो सपने , जो कभी देखे थे तुमने
दामन में तुम्हारे , सिमट सिमट जाएँ
नाचे खुशियाँ , आँगन मे तेरे
दुख की कभी कहीं , बदली न छाए ।
तुम्हारा ये जन्म दिन
हर पल , हर छिन
बने ऐसे ही एहसासों का गुलशन
सफलताओं के हजार फूल खिलें
ज्ञान के दीप जलें
हों वारिश खुसियों की
भींगे तन मन ।
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