मंगलवार, 8 दिसंबर 2020

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव : तू तू मैं मैं के कारण

 

                   अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव : तू तू मैं मैं के कारण  


अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव तो हो गया पर अंतिम परिणाम निकले मे इतनी देरी क्यों हुई ? भारत मे तो मतगणना होने के लगभग 24 घंटे के अंदर कौन जीता कौन हारा इसकी घोषणा कर दी जाती है, फिर अमेरिका में ऐसा क्यों नहीं ? वहाँ नतीजों की घोषणा मे आखिर इतनी देर क्यों लगती है, और घोषणा हो जाने के बाद भी मैं जीता, तू हारा, नहीं तू हारा, मैं जीता, इतनी तू तू मैं मैं क्यों होती है? भूतपूर्व राष्ट्रपति ट्रम्प बार बार यह दावा





कर रहे हैं कि चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधली हुई है और वास्तविकता यह कि वो चुनाव जीत चुके हैं, कि उन्हें जान बुझ कर हराने का षड्यन्त्र किया गया है। वहीं दूसरी ओर जोसेफ बीडेन सारे आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए यह कहते हैं कि ट्रम्प हार चुके हैं। मेरी जीत पर किसी को कोई शंका नहीं होनी चाहिए। आखिर अमेरिकी  चुनाव 
                                                          
                                                             

                                                                                 

प्रणाली मे ऐसी क्या बात है कि चुनाव सम्पन्न हो जाने के बाद भी इस तरह का तू तू मै मै जारी है । यद्यपि अब यह निश्चित हो चुका है कि बीडेन जीत चुके हैं, फिर भी यह प्रश्न तो अभी भी खड़ा  है कि आखिर इस तरह का तू तू मैं मैं  क्यों ? इस प्रश्न का जबाब अमेरिकी चुनाव प्रणाली मे ही निहित है।

अमेरिकी राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति चुनाव प्रक्रिया 


अमेरिका में राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति का निर्वाचन कहने को तो सीधे जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से होता है, पर वास्तविकता मे ऐसा है नहीं। इन दोनों का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से 538 सदस्यों के एक समूह जिसे इलेक्टरल कालेज (Electoral College) के नाम से जाना जाता है, के द्वारा होता है। इलेक्टरल कालेज के इन सदस्यों का चुनाव पार्टी आधार पर, खास कर राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति के चुनाव के लिए अमेरिका के सभी राज्यों में रजिस्टर्ड मतदाताओं द्वारा होता है। अमेरिका में कुल 50 राज्य हैं और इन सभी 50 राज्यों में उनकी जनसंख्या के आधार पर इलेक्टरल कॉलेज के सदस्यों का कोटा निर्धारित होता है। डेमोक्रैट एवं रिपब्लिकन दोनों पार्टियां सभी राज्यों मे अपने अपने उम्मीदवार चुनाव के लिए खड़ा करते हैं तथा इनका निर्वाचन अमेरिकी नागरिकों द्वारा प्रत्यक्ष चुनाव पद्धति द्वारा होता है। जिस किसी पार्टी का उम्मीदवार बहुमत के आधार पर इन राज्यों मे विजयी घोषित होते हैं, उन्हें राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति चुनने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। कुल 538 सदस्यों के इलेक्टरल कॉलेज के समूह मे राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति चुने जाने के लिए कम से कम 270 वोट प्राप्त करना आवश्यक है। 2020 मे हुए वर्तमान चुनाव मे बीडेन को 306 एवं ट्रम्प को 232 सदस्यों का समर्थन प्राप्त हुआ, जिस कारण बीडेन अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए हैं।         

 

अमेरिकी चुनाव प्रणाली की  खामियाँ : तू तू मैं मैं का कारण 

1. अमेरिका मे भारत की तरह का कोई Election Commission of India नहीं है, जो पूरे देश मे राज्य तथा केन्द्र, दोनों स्तरों का चुनाव कराती हो। वहाँ एक Federal Election Commission अवश्य है पर उसका कार्य चुनाव मे भाग ले रहे उम्मीदवारों द्वारा चुनाव अभियान मे किए जा रहे आय-व्यय पर नजर रखना तथा इससे संबंधित कानूनों को लागू कराना मात्र है। भारत मे यह कार्य भी भारतीय निर्वाचन आयोग ही करती है। वहाँ सारे चुनाव राज्यों के द्वारा चुने गए स्थानीय स्तर के अधिकारियों द्वारा ही कराये  जाते  हैं । यहाँ तक कि केन्द्रीय स्तर का चुनाव जैसे राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव भी इन्हीं राज्य स्तर के स्थानीय अधिकारियों द्वारा बिना किसी केन्द्रीय प्राधिकारण के अधीन तथा देख-रेख के कराया जाता है।

भारत में राज्य स्तर जैसे एम.एल.ए का चुनाव हो या केन्द्रीय स्तर जैसे एम.पी का चुनाव हो, दोनों ही चुनाव भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) द्वारा हीं कराए जाते हैं। चुनाव के समय राज्यों के स्थानीय अधिकारी जैसे सिविल सर्वेन्ट, पुलिस, क्लर्क तथा अन्य विभागों के अधिकारी भी चुनाव आयोग के अधीन हो जाते हैं और आयोग के निर्देशानुसार ही काम करते हैं। केन्द्रीय चुनाव आयोग को राज्यों तथा केन्द्रीय स्तर के चुनाव कराने के लिए, चुनाव के समय बहुत ही बड़े पैमाने पर अधिकार प्राप्त हो जाते हैं। आयोग, चुनाव कार्य मे लगे किसी भी अधिकारी को भ्रष्ट आचरण करने या निर्देशानुसार काम न करने पर निलंबित (suspend) कर सकता है। इसके अलावा अन्य तरह के दंड भी दे सकता है। चुकि  भारत मे केन्द्रीय स्तर पर एक स्वतंत्र निर्वाचन आयोग है, जो चुनाव संबंधित सारे फैसले लेता है, अतः सभी राज्यों के मतपत्रों का डिजाइन, चुनाव की तारीख, कर्मचारियों का चुनाव और उनका प्रशिक्षण, सारे काम इस आयोग द्वारा ही होता है। इसमे राज्य सरकारों द्वारा कर्मचारी मुहैया कराने के अलावा कोई अन्य दखल नहीं होता। 


2. अमेरिका में चुकि इस तरह की कोई संवैधानिक केन्द्रीय संस्था नहीं है जिसे सारे देश में राज्य और केंद्र दोनों स्तर के चुनाव कराने का अधिकार प्राप्त हो, अतः सारे चुनाव राज्य स्तर के स्थानीय अधिकारियों द्वारा ही कराया जाता है। उसमें भी मजा ये कि हर राज्य अपना अपना कानून बनाने के लिए स्वतंत्र है। मतदाताओं का  रेजिस्ट्रैशन करना हो या वोटर लिस्ट बनाना, वोटर का सत्यापन करने, चुनाव की तिथि निर्धारित करने, बैलट पेपर तैयार करने, चुनाव कराने के लिए कर्मचारियों का चयन तथा चुनाव करने एवं नतीजा घोषित करने तक का सभी अधिकार राज्य सरकार के इन्हीं प्रशासकों एवं कर्मचारियों को प्राप्त है। अमेरिका में कुल 50 राज्य हैं । अब आप कल्पना कर सकते हैं कि जब सभी राज्य, जहां अलग अलग पार्टियां सत्तारुढ़ हैं, उन्हें बैलट पेपर का डिजाइन तैयार करने से लेकर चुनाव कराने एवं अंतिम परिणाम घोषित करने तक का अधिकार प्राप्त हो, तो चुनाव नतीजे पर उंगलियाँ तो उठेगी हीं ।


3. प्रत्येक राज्य, चुनाव संबंधित कार्यों के निष्पादन के लिए, एक चीफ इलेक्शन ऑफिसियल का चुनाव करती है जिसके प्रशासनीक क्षेत्र के अंदर एवं दिशा निर्देश पर राज्य के सारे चुनाव अधिकारी काम करते हैं। ज्यादातर राज्यों, करीब 24 राज्यों मे सेक्रेटरी आफ स्टेट ही चीफ इलेक्शन ऑफिसियल होता है। सेक्रेटरी आफ स्टेट पद पर नियुक्ति पार्टी आधारित चुनाव प्रक्रिया द्वारा होता है। कुछ अन्य राज्यों मे चीफ एलेक्शन ऑफिसियल के चुनाव की प्रक्रिया भिन्न है। स्पष्ट है कि ये चीफ इलेक्शन ऑफिसियल, जो भी पार्टी जिस राज्य मे बहुमत में हैं, उनके वोट के बल पर ही जीतकर आते हैं, अतः उस पार्टी से सम्बद्ध होते हैं ; भारत के चीफ इलेक्शन कमिशनर की तरह असंबद्ध नहीं होते। कर्मचारियों का चुनाव तथा प्रशिक्षण, राज्य स्तर पर वोटर लिस्ट एवं डाटा संग्रह, चुनाव अधिकारियों को वोटिंग मशिन एवंअन्य चुनाव सामग्री मुहैया कराना, चुनाव संबंधित अन्य सारे कार्य इन्हीं राज्य स्तरीय चीफ इलेक्शन ऑफिसियल की देखरेख मे होता है। चुकि चीफ इलेक्शन ऑफिसियल या सेक्रेटरी आफ स्टेट का चुनाव पार्टी आधार पर होता है, अतः विभन्न राज्यों के चुनाव अधिकारी अलग अलग पार्टियों के होते हैं। ऐसे में चुनाव अधिकारियों पर दोषारोपण करना और भी आसान हो जाता है। जाँर्जिया, मिशिगन, पेंसिलवानिया , विस्कोसिन तथा अन्य कई राज्यों के चुनाव अधिकारियों पर ट्रम्प की ओर से चुनाव में धांधली के आरोप लगाए गए हैं। कारण यह कि इन राज्यों के चीफ इलेक्शन ऑफिसियल रिपब्लिकन पार्टी का न होकर डेमोक्रैट पार्टी से सम्बद्ध हैं।


4 . अमेरिकी प्रणाली की सबसे बड़ी खामी यह है कि लोग वोट तो देते हैं राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति के लिए खड़े उम्मीदवारों के नाम पर, परंतु इलेक्टरल कालेज सिस्टम होने के कारण उस क्षेत्र से चुनकर आता है कोई और ही व्यक्ति। और बाद मे यही लोग राष्ट्रपति का चुनाव करते हैं । प्रत्यक्ष चुनाव पद्धति न होने के कारण, राष्ट्रपति पद का एक उम्मीदवार सारे देश मे पड़े वोटों की कुल संख्या का बहुमत प्राप्त करने के बाद भी राष्ट्रपति बनने से बँचित रह सकता है, यदि उसे 538 सदस्यों के इलेक्टरल कॉलेज मे बहुमत अर्थात 270 वोट प्राप्त नहीं है तो। जैसे यदि कोई व्यक्ति सारे देश के विभिन्न राज्यों मे हुए प्रत्यक्ष चुनाव मे जनता द्वारा डाले गए कुल वोटों की संख्या का 55% प्राप्त करता है, परंतु इलेक्टरल कॉलेज मे उसे बहुमत प्राप्त नहीं है, तो वह राष्ट्रपति नहीं बन सकता।


5 . जहां तक चुनावों मे धांधली का प्रश्न है, भारतीय चुनाव पद्धति की तुलना मे अमेरिका मे इसकी संभावना बहुत ज्यादा है। भारत में श्री टी.एन शेषन के पहले राज्यों मे चुनाव के समय किस प्रकार की धांधलियाँ होती थी, ये पूरा देश देख चुका है। शेषन ने राज्य सरकारों का चुनाव मे हस्तक्षेप केन्द्रीय सुरक्षा बलों को मतदान बूथों पर नियुक्त कर लगभग समाप्त कर दिया। इसी के साथ अन्य नियमों को भी कड़ाई से पालन कराया। ऐसा वे इसलिए कर सके क्योंकि वे किसी पार्टी से सम्बद्ध नहीं थे। राज्यों के चुनाव अधिकारी यदि किसी पार्टी से सम्बद्ध हों, तो निश्चित रूप से चुनाव मे धांधली की संभावना बढ़ जाती है। राज्य सरकार का यदि सर्वोच्च चुनाव अधिकारी या कोई नीचे का ही कर्मचारी सत्तारूढ़ पार्टी के पक्ष मे वोटिंग करवाता है, या अन्य तरह की धांधली करता है, तो उसे देखने वाला कौन है। राज्य मे सत्तारूढ़ पार्टी यदि खुद ही धांधली करवा रही हो तो, उससे प्रश्न करने वाला कौन है ? सिवाय कोर्ट मे इस धांधली की शिकायत करने के अलावा क्या रास्ता बचता है ?

भारत में चुनाव आयोग चुकि किसी पार्टी से सम्बद्ध न होकर एक स्वतंत्र संस्था है तथा जिसके फैसलों को न केन्द्रीय सरकार और न राज्य सरकारें प्रभावित कर सकती हैं, अतः इसकी विश्वसनीयता पर कोई सवाल नहीं उठा सकता। यहाँ तक कि केन्द्र सरकार भी चीफ इलेक्शन कमिशनर या उसके साथ के अन्य कमिश्नरों को हटा नहीं सकता है। इसीलिए यहाँ चीफ इलेक्शन कमिश्नर निर्भीक हो कर काम करते हैं। मैं यह नहीं कहता कि विकेंद्रीकृत चुनाव प्रणाली होने के कारण अमेरिका मे बड़े पैमाने पर चुनाव में धांधली होती है। होती है या नहीं, ये तो जांच का विषय है। पर ट्रम्प तो यही कह रहे हैं धांधली हुई और दूसरी ओर बीडेन कह रहे हैं नहीं हुई। स्पष्ट है इस तू तू मैं मैं का सबसे बड़ा कारण है अमेरिकी चुनाव प्रणाली मे निहित संरचनात्मक दोष के कारण विश्वसनीयता का अभाव।


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learnaalaya





 

       



       




























































































1 टिप्पणी:

  1. बहुत अच्छा लेख हैं।अमेरिकन चुनाव प्रणाली के बारे में जानकारी प्राप्तहुई।

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