सोमवार, 19 अक्टूबर 2015

प्रतीक्षा


              
                
                प्रतीक्षा


दूर, पहाड़ियों से उतरती,
मटकती चहकती
पतली काली सी वो राह
जाने क्यों इन दिनों
पड़ी है चुपचाप, निष्प्राण
न हिलती है, न डुलती है ।


देखता हूँ रोज ही उसे
बैठ ऊंचे टीले पर, सामने
ज्येष्ठ की धधकती धूप में भी
अनवरत, एक टक , बिना थके
कि शायद क्षितिज से कोई बिन्दु उभरे
कोई जाना पहचाना चेहरा या आवाज
आकार कहे, आओ चलो, घर चलें ।


पूछता हूँ रोज हीं रातों में
बादलों के पार, छुपते निकलते
तारों से, चंदा मामा से,
क्या मम्मी याद नहीं करतीं ?
पाँचवाँ दिन है आज छुट्टियों के
पापा को यह भी याद नहीं
सब तो जा चुके कबके, सिवा मेरे
दादी क्या तुम भी भूल गई ?


अब तो कक्षाओं मे लगे ब्लैकबोर्ड भी
पूछने लगे हैं प्रश्न
कब जाओगे, कोई आया क्यों नहीं ?
यज्ञ वेदिका जो कभी गूँजती थी ऋचाओं से
अब अग्नि प्रज्ज्वलित नहीं होती
भोजन की घंटी पर थाली ले
सरपट नहीं भागता अब कोई ।


अब तो बस पलास के ये पेड़
हरे बांस के झुरमुट, पीपल
आम के पेड़ों पर लगे मंजरों के ढेर
यही दोस्त हैं मेरे ;
जब भी उदास होता हूँ
बरगद से लिपट खूब रोता हूँ
गिलहरियाँ तो ताकती हैं सहमकर
पर बंदर खिलखिलाते है खुलकर ।


तैयार हूँ आज भी सुबह से हीं
कौन जाने कब आ जाए कोई
पहले दोपहर, फिर शाम ढली
वक्त चलता रहा
उम्मीदें यूं ही पिघलती रहीं ;
अब तो बगुले भी लौटने लगे हैं घर
हाँफता सूरज
खुश है छुट्टी पाकर ।


क्षितिज पहले लाल, फिर स्याह हो चला
सितारे फिर उभरे, चाँद फिर निकला
पर आज भी नहीं आया कोई ।


                                           ***       


  

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