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मंगलवार, 8 दिसंबर 2020

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव : तू तू मैं मैं के कारण

 

                   अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव : तू तू मैं मैं के कारण  


अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव तो हो गया पर अंतिम परिणाम निकले मे इतनी देरी क्यों हुई ? भारत मे तो मतगणना होने के लगभग 24 घंटे के अंदर कौन जीता कौन हारा इसकी घोषणा कर दी जाती है, फिर अमेरिका में ऐसा क्यों नहीं ? वहाँ नतीजों की घोषणा मे आखिर इतनी देर क्यों लगती है, और घोषणा हो जाने के बाद भी मैं जीता, तू हारा, नहीं तू हारा, मैं जीता, इतनी तू तू मैं मैं क्यों होती है? भूतपूर्व राष्ट्रपति ट्रम्प बार बार यह दावा





कर रहे हैं कि चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधली हुई है और वास्तविकता यह कि वो चुनाव जीत चुके हैं, कि उन्हें जान बुझ कर हराने का षड्यन्त्र किया गया है। वहीं दूसरी ओर जोसेफ बीडेन सारे आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए यह कहते हैं कि ट्रम्प हार चुके हैं। मेरी जीत पर किसी को कोई शंका नहीं होनी चाहिए। आखिर अमेरिकी  चुनाव 
                                                          
                                                             

                                                                                 

प्रणाली मे ऐसी क्या बात है कि चुनाव सम्पन्न हो जाने के बाद भी इस तरह का तू तू मै मै जारी है । यद्यपि अब यह निश्चित हो चुका है कि बीडेन जीत चुके हैं, फिर भी यह प्रश्न तो अभी भी खड़ा  है कि आखिर इस तरह का तू तू मैं मैं  क्यों ? इस प्रश्न का जबाब अमेरिकी चुनाव प्रणाली मे ही निहित है।

अमेरिकी राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति चुनाव प्रक्रिया 


अमेरिका में राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति का निर्वाचन कहने को तो सीधे जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से होता है, पर वास्तविकता मे ऐसा है नहीं। इन दोनों का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से 538 सदस्यों के एक समूह जिसे इलेक्टरल कालेज (Electoral College) के नाम से जाना जाता है, के द्वारा होता है। इलेक्टरल कालेज के इन सदस्यों का चुनाव पार्टी आधार पर, खास कर राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति के चुनाव के लिए अमेरिका के सभी राज्यों में रजिस्टर्ड मतदाताओं द्वारा होता है। अमेरिका में कुल 50 राज्य हैं और इन सभी 50 राज्यों में उनकी जनसंख्या के आधार पर इलेक्टरल कॉलेज के सदस्यों का कोटा निर्धारित होता है। डेमोक्रैट एवं रिपब्लिकन दोनों पार्टियां सभी राज्यों मे अपने अपने उम्मीदवार चुनाव के लिए खड़ा करते हैं तथा इनका निर्वाचन अमेरिकी नागरिकों द्वारा प्रत्यक्ष चुनाव पद्धति द्वारा होता है। जिस किसी पार्टी का उम्मीदवार बहुमत के आधार पर इन राज्यों मे विजयी घोषित होते हैं, उन्हें राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति चुनने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। कुल 538 सदस्यों के इलेक्टरल कॉलेज के समूह मे राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति चुने जाने के लिए कम से कम 270 वोट प्राप्त करना आवश्यक है। 2020 मे हुए वर्तमान चुनाव मे बीडेन को 306 एवं ट्रम्प को 232 सदस्यों का समर्थन प्राप्त हुआ, जिस कारण बीडेन अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए हैं।         

 

अमेरिकी चुनाव प्रणाली की  खामियाँ : तू तू मैं मैं का कारण 

1. अमेरिका मे भारत की तरह का कोई Election Commission of India नहीं है, जो पूरे देश मे राज्य तथा केन्द्र, दोनों स्तरों का चुनाव कराती हो। वहाँ एक Federal Election Commission अवश्य है पर उसका कार्य चुनाव मे भाग ले रहे उम्मीदवारों द्वारा चुनाव अभियान मे किए जा रहे आय-व्यय पर नजर रखना तथा इससे संबंधित कानूनों को लागू कराना मात्र है। भारत मे यह कार्य भी भारतीय निर्वाचन आयोग ही करती है। वहाँ सारे चुनाव राज्यों के द्वारा चुने गए स्थानीय स्तर के अधिकारियों द्वारा ही कराये  जाते  हैं । यहाँ तक कि केन्द्रीय स्तर का चुनाव जैसे राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव भी इन्हीं राज्य स्तर के स्थानीय अधिकारियों द्वारा बिना किसी केन्द्रीय प्राधिकारण के अधीन तथा देख-रेख के कराया जाता है।

भारत में राज्य स्तर जैसे एम.एल.ए का चुनाव हो या केन्द्रीय स्तर जैसे एम.पी का चुनाव हो, दोनों ही चुनाव भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) द्वारा हीं कराए जाते हैं। चुनाव के समय राज्यों के स्थानीय अधिकारी जैसे सिविल सर्वेन्ट, पुलिस, क्लर्क तथा अन्य विभागों के अधिकारी भी चुनाव आयोग के अधीन हो जाते हैं और आयोग के निर्देशानुसार ही काम करते हैं। केन्द्रीय चुनाव आयोग को राज्यों तथा केन्द्रीय स्तर के चुनाव कराने के लिए, चुनाव के समय बहुत ही बड़े पैमाने पर अधिकार प्राप्त हो जाते हैं। आयोग, चुनाव कार्य मे लगे किसी भी अधिकारी को भ्रष्ट आचरण करने या निर्देशानुसार काम न करने पर निलंबित (suspend) कर सकता है। इसके अलावा अन्य तरह के दंड भी दे सकता है। चुकि  भारत मे केन्द्रीय स्तर पर एक स्वतंत्र निर्वाचन आयोग है, जो चुनाव संबंधित सारे फैसले लेता है, अतः सभी राज्यों के मतपत्रों का डिजाइन, चुनाव की तारीख, कर्मचारियों का चुनाव और उनका प्रशिक्षण, सारे काम इस आयोग द्वारा ही होता है। इसमे राज्य सरकारों द्वारा कर्मचारी मुहैया कराने के अलावा कोई अन्य दखल नहीं होता। 


2. अमेरिका में चुकि इस तरह की कोई संवैधानिक केन्द्रीय संस्था नहीं है जिसे सारे देश में राज्य और केंद्र दोनों स्तर के चुनाव कराने का अधिकार प्राप्त हो, अतः सारे चुनाव राज्य स्तर के स्थानीय अधिकारियों द्वारा ही कराया जाता है। उसमें भी मजा ये कि हर राज्य अपना अपना कानून बनाने के लिए स्वतंत्र है। मतदाताओं का  रेजिस्ट्रैशन करना हो या वोटर लिस्ट बनाना, वोटर का सत्यापन करने, चुनाव की तिथि निर्धारित करने, बैलट पेपर तैयार करने, चुनाव कराने के लिए कर्मचारियों का चयन तथा चुनाव करने एवं नतीजा घोषित करने तक का सभी अधिकार राज्य सरकार के इन्हीं प्रशासकों एवं कर्मचारियों को प्राप्त है। अमेरिका में कुल 50 राज्य हैं । अब आप कल्पना कर सकते हैं कि जब सभी राज्य, जहां अलग अलग पार्टियां सत्तारुढ़ हैं, उन्हें बैलट पेपर का डिजाइन तैयार करने से लेकर चुनाव कराने एवं अंतिम परिणाम घोषित करने तक का अधिकार प्राप्त हो, तो चुनाव नतीजे पर उंगलियाँ तो उठेगी हीं ।


3. प्रत्येक राज्य, चुनाव संबंधित कार्यों के निष्पादन के लिए, एक चीफ इलेक्शन ऑफिसियल का चुनाव करती है जिसके प्रशासनीक क्षेत्र के अंदर एवं दिशा निर्देश पर राज्य के सारे चुनाव अधिकारी काम करते हैं। ज्यादातर राज्यों, करीब 24 राज्यों मे सेक्रेटरी आफ स्टेट ही चीफ इलेक्शन ऑफिसियल होता है। सेक्रेटरी आफ स्टेट पद पर नियुक्ति पार्टी आधारित चुनाव प्रक्रिया द्वारा होता है। कुछ अन्य राज्यों मे चीफ एलेक्शन ऑफिसियल के चुनाव की प्रक्रिया भिन्न है। स्पष्ट है कि ये चीफ इलेक्शन ऑफिसियल, जो भी पार्टी जिस राज्य मे बहुमत में हैं, उनके वोट के बल पर ही जीतकर आते हैं, अतः उस पार्टी से सम्बद्ध होते हैं ; भारत के चीफ इलेक्शन कमिशनर की तरह असंबद्ध नहीं होते। कर्मचारियों का चुनाव तथा प्रशिक्षण, राज्य स्तर पर वोटर लिस्ट एवं डाटा संग्रह, चुनाव अधिकारियों को वोटिंग मशिन एवंअन्य चुनाव सामग्री मुहैया कराना, चुनाव संबंधित अन्य सारे कार्य इन्हीं राज्य स्तरीय चीफ इलेक्शन ऑफिसियल की देखरेख मे होता है। चुकि चीफ इलेक्शन ऑफिसियल या सेक्रेटरी आफ स्टेट का चुनाव पार्टी आधार पर होता है, अतः विभन्न राज्यों के चुनाव अधिकारी अलग अलग पार्टियों के होते हैं। ऐसे में चुनाव अधिकारियों पर दोषारोपण करना और भी आसान हो जाता है। जाँर्जिया, मिशिगन, पेंसिलवानिया , विस्कोसिन तथा अन्य कई राज्यों के चुनाव अधिकारियों पर ट्रम्प की ओर से चुनाव में धांधली के आरोप लगाए गए हैं। कारण यह कि इन राज्यों के चीफ इलेक्शन ऑफिसियल रिपब्लिकन पार्टी का न होकर डेमोक्रैट पार्टी से सम्बद्ध हैं।


4 . अमेरिकी प्रणाली की सबसे बड़ी खामी यह है कि लोग वोट तो देते हैं राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति के लिए खड़े उम्मीदवारों के नाम पर, परंतु इलेक्टरल कालेज सिस्टम होने के कारण उस क्षेत्र से चुनकर आता है कोई और ही व्यक्ति। और बाद मे यही लोग राष्ट्रपति का चुनाव करते हैं । प्रत्यक्ष चुनाव पद्धति न होने के कारण, राष्ट्रपति पद का एक उम्मीदवार सारे देश मे पड़े वोटों की कुल संख्या का बहुमत प्राप्त करने के बाद भी राष्ट्रपति बनने से बँचित रह सकता है, यदि उसे 538 सदस्यों के इलेक्टरल कॉलेज मे बहुमत अर्थात 270 वोट प्राप्त नहीं है तो। जैसे यदि कोई व्यक्ति सारे देश के विभिन्न राज्यों मे हुए प्रत्यक्ष चुनाव मे जनता द्वारा डाले गए कुल वोटों की संख्या का 55% प्राप्त करता है, परंतु इलेक्टरल कॉलेज मे उसे बहुमत प्राप्त नहीं है, तो वह राष्ट्रपति नहीं बन सकता।


5 . जहां तक चुनावों मे धांधली का प्रश्न है, भारतीय चुनाव पद्धति की तुलना मे अमेरिका मे इसकी संभावना बहुत ज्यादा है। भारत में श्री टी.एन शेषन के पहले राज्यों मे चुनाव के समय किस प्रकार की धांधलियाँ होती थी, ये पूरा देश देख चुका है। शेषन ने राज्य सरकारों का चुनाव मे हस्तक्षेप केन्द्रीय सुरक्षा बलों को मतदान बूथों पर नियुक्त कर लगभग समाप्त कर दिया। इसी के साथ अन्य नियमों को भी कड़ाई से पालन कराया। ऐसा वे इसलिए कर सके क्योंकि वे किसी पार्टी से सम्बद्ध नहीं थे। राज्यों के चुनाव अधिकारी यदि किसी पार्टी से सम्बद्ध हों, तो निश्चित रूप से चुनाव मे धांधली की संभावना बढ़ जाती है। राज्य सरकार का यदि सर्वोच्च चुनाव अधिकारी या कोई नीचे का ही कर्मचारी सत्तारूढ़ पार्टी के पक्ष मे वोटिंग करवाता है, या अन्य तरह की धांधली करता है, तो उसे देखने वाला कौन है। राज्य मे सत्तारूढ़ पार्टी यदि खुद ही धांधली करवा रही हो तो, उससे प्रश्न करने वाला कौन है ? सिवाय कोर्ट मे इस धांधली की शिकायत करने के अलावा क्या रास्ता बचता है ?

भारत में चुनाव आयोग चुकि किसी पार्टी से सम्बद्ध न होकर एक स्वतंत्र संस्था है तथा जिसके फैसलों को न केन्द्रीय सरकार और न राज्य सरकारें प्रभावित कर सकती हैं, अतः इसकी विश्वसनीयता पर कोई सवाल नहीं उठा सकता। यहाँ तक कि केन्द्र सरकार भी चीफ इलेक्शन कमिशनर या उसके साथ के अन्य कमिश्नरों को हटा नहीं सकता है। इसीलिए यहाँ चीफ इलेक्शन कमिश्नर निर्भीक हो कर काम करते हैं। मैं यह नहीं कहता कि विकेंद्रीकृत चुनाव प्रणाली होने के कारण अमेरिका मे बड़े पैमाने पर चुनाव में धांधली होती है। होती है या नहीं, ये तो जांच का विषय है। पर ट्रम्प तो यही कह रहे हैं धांधली हुई और दूसरी ओर बीडेन कह रहे हैं नहीं हुई। स्पष्ट है इस तू तू मैं मैं का सबसे बड़ा कारण है अमेरिकी चुनाव प्रणाली मे निहित संरचनात्मक दोष के कारण विश्वसनीयता का अभाव।


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मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015

विकास पुरुष नितीश : कितना झूठ कितना सच



विश्लेषण की दृष्टि से देखें तो  नितीश की राजनीतिक यात्रा के दो महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। पहला, जब वर्ष 2000 मे बीजेपी ने राज्य मे जेडीयू तथा समता पार्टी (21+34=55) दोनों के कुल सीटों से ज्यादा सीटें (67) पाने के बावजूद नितीश को बिहार के मुख्य मंत्री के रूप मे प्रोजेक्ट किया। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि उस समय के बीजेपी के केंद्रीय नेताओं ने वास्तविकता मे केंद्र मे सत्ता पाने के लोभ मे राज्य के हितों की अनदेखी कर दी, वरना क्या कारण था कि राज्य मे जेडीयू एवं समता दोनों से संयुक्त रूप से भी बड़ी पार्टी होने तथा ज्यादा सीटें जीतने के वावजूद बीजेपी ने अपना मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट क्यों नहीं किया। नितीश को मुख्य मंत्री के रूप मे प्रोजेक्ट करने वालों मे बीजेपी के लाल कृष्ण आडवाणी का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है। पर नितीश को मुख्य मंत्री के रूप मे प्रोजेक्ट करना बीजेपी का  कितना गलत निर्णय था इसकी मिसाल तब देखने को मिली, जब 2010 मे एक रैली के लिए पटना मे आए बीजेपी के नेताओं को भोजन पर आने का निमंत्रण देकर, नितीश ने मोदी द्वेष के कारण अपने रावण से भी बड़े अहंकार का परिचय दिया। अंतिम समय मे सारे बुलाये गए बीजेपी नेताओं को भोजन का निमंत्रण रद्द कर दिया गया। मजे की बात यह कि जिन नेताओं का निमंत्रण रद्द किया गया उसमे लाल कृष्ण आडवाणी भी थे, वही आडवाणी जिन्होंने बीजेपी के राज्य इकाई के हितों की बली देकर नितीश को मुख्य मंत्री के रूप मे प्रोजेक्ट किया था। खैर ये तो वर्ष 2010 की बात है, फिर से लौटते है वर्ष 2000 की ओर। 

वर्ष 2000 से लेकर वर्ष 2013 तक , जब नितीश ने शायद देश का प्रधान मंत्री बनाने की अति महत्वाकांक्षा तथा अपने हिमालय से भी बड़े अहंकार के कारण बीजेपी से तलाक ले लिया - इस पूरे काल खंड को मैं नितीश का पहला पड़ाव मानता हूँ। नितीश का ये काल खंड शायद उनके जीवन का उत्कृष्टतम काल खंड है, जिसमे उन्होने बीजेपी के सहयोग से नई उचाइयों को छूआ। वर्ष 2000 मे यद्यपि सिर्फ 8 दिन ही पहली बार मुख्य मंत्री रहे, परन्तु एनडीए मे उनका वर्चस्व तथा नेतृत्व स्थापित करने मे ये 8 दिन अति महत्व पूर्ण साबित हुए। 2005 के चुनाव मे पहली बार एनडीए को पूर्ण बहुमत मिला जब बीजेपी को 55 तथा जेडीयू को 88 सीटें प्राप्त हुई तथा नितीश इसके मुख्य मंत्री बने। 2010 के चुनाव मे एनडीए फिर से पूर्ण बहुमत प्राप्त करने मे सफल रही। इस बार तो 2005 के मुक़ाबले और भी ज्यादा सीटें, बीजेपी 91 तथा जेडीयू 115 सीटें प्राप्त करने मे सफल हुई। इसमे कोई शक नहीं कि एनडीए इस काल खंड मे बिहार मे विकास करने मे सफल हुई। 2005-06 मे जिस बिहार का जीडीपी ग्रोथ रेट निगेटिव था, वह अगले 7 वर्षों तक अर्थात 2006-07 से 20013-14 तक, प्रति वर्ष लगभग 12% के ऊंचे एवरेज जीडीपी विकास दर को प्राप्त करने मे सफल रहा। यह सफलता जमीन पर भी लोगों को दिखाई दिया। सबसे बड़ी सफलता थी बिहार से लालू के नेतृत्व वाली जंगल राज की समाप्ती। इस सारी सफलता का श्रेय मिला नितीश को, जबकि वास्तविकता यह थी कि इस सफलता मे बीजेपी का बहुत बड़ा योगदान था। सुशील कुमार मोदी, जो इस मंत्रिमंडल मे वित्त मंत्री के साथ साथ उप मुख्य मंत्री भी थे, बिहार के इस बदलाव मे उनका बहुत बड़ा योगदान था। वित्त की जितनी समझ इन्हे थी तथा जिस सूझ बुझ से इन्होंने बिहार मे बजट तथा विभिन्न विभागों के वित्तीय आवश्यकताओं मे ताल मेल बैठाया, उसने बिहार का चेहरा बदलने मे




एक बड़ी भूमिका निभाई, पर बीजेपी के इस योग्यतम नेता को जितना क्रेडिट मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला। सारा क्रेडिट नितीश ले गए और इन्हें विकास पुरुष का खिताब तक मिल गया। खैर, यहा तक तो फिर भी ठीक था, पर इस विकास पुरुष के खिताब ने नितीश की महत्वाकांक्षा की आग मे घी का काम किया। इस आग मे घी डालने का काम बीजेपी विरोधी मीडिया ने भी खुलकर किया। कुछ अखबारों ने तो नितीश को देश का भावी प्रधान मंत्री तक निरूपित करना शुरू कर दिया। बस यहीं से नितीश के पतन तथा उनके राजनीतिक जीवन के दूसरे पड़ाव की कहानी शुरू होती है। 

20014 का लोक सभा का चुनाव सिर पर आने ही वाला था। नितीश को लगा कि यदि वो बिहार मे अच्छी संख्या मे सीटें जीतने मे सफल होते हैं, तो लोकसभा चुनाव मे बीजेपी या विरोधी मोर्चा जो भी अच्छी संख्या मे सीटें जीतने मे सफल होंगी उनके सहयोग से वे प्रधान मंत्री बन सकते हैं। उनके चाटुकार उन्हें यह समझने मे सफल रहे कि यदि बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी होकर उभरती है, तब भी वह इतनी सीटें नहीं प्राप्त कर पाएगी कि अपने दम पर सरकार बना सके। ऐसी हालत मे वे बीजेपी से इतर की पार्टियों जैसे ममता, बीजेडी, सीपीएम, कांग्रेस तथा ऐसी ही अन्य पार्टियों को अपने विकास पुरुष की छवि के दम पर सरकार बनाने के लिए सहयोग देने पर राजी कर लेंगे। इसके अलावा एक दूसरा आकलन भी था कि वे बीजेपी के सहयोग से भी अपनी सरकार बना सकते हैं। लाल कृष्ण आडवाणी ने वैसे भी नितीश को बिहार मे बीजेपी की अधिक संख्या होने के बावजूद मुख्य मंत्री बनाने मे सहयोग तो किया ही था। अत: आकलन यह था कि यदि बीजेपी अपने दम पर सरकार नहीं बना सकी, जिसकी सबसे ज्यादा संभावना है, तो वह आडवाणी को फिर से अपने नाम पर समर्थन देने के लिए मना लेंगे। यदि आडवाणी मान गए तो ममता, नवीन पटनायक, मुलायम, डीएमके, एडीएमके आदि पार्टियों से सहयोग प्राप्त करना उतना कठिन नहीं होगा। पर भाग्य को कुछ और ही मंजूर था। नियति के एक थपेरे ने इनके सारे मंसूबों को चकनाचूर कर रख दिया। बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को अपना प्रधान मंत्री उम्मीदवार न सिर्फ चुन लिया बल्कि उसकी घोषणा भी कर दी। नितीश ने अंत अंत तक यह प्रयास किया कि बीजेपी मोदी को न चुन आडवाणी को अपना प्रधान मंत्री का उम्मीदवार तय करे क्योंकि उनके आकलन अनुसार प्रधान मंत्री बनाने मे यदि कोई व्यक्ति उनकी मदद कर सकता था तो वह लाल कृष्ण आडवाणी ही हो सकते थे न कि मोदी। 


यहीं से शुरू होती है नितीश के पतन की कहानी। अच्छी भली सरकार चल रही थी, पर आडवाणी को प्रधान मंत्री का उम्मीदवार बनाने एवं मोदी का विरोध करने के लिए नितीश ने बीजेपी के आंतरिक मामलों मे दखल देना शुरू किया। दबाब बनाने के लिए नितीश ने यहाँ तक एलान कर दिया कि बीजेपी यदि मोदी को अपना उम्मीदवार चुनती है तो वह संबंध विच्छेद कर लेगी। पर वे भूल गए कि बीजेपी कोई एक नेता पर आधारित पारिवारिक पार्टी नहीं है। वही हुआ जिसका नितीश को डर था। बीजेपी ने मोदीको चुन लिया, पर तब तक अपने महत्वाकांक्षा तथा अहंकार मे अंधे होकर नितीश इतना ज्यादा आगे बढ़ चुके थे कि वापस लौटने का भी कोई रास्ता नहीं बचा और अंतत: दिनांक 16 जून, 2013 को उन्होने एक प्रैस कान्फ्रेंस कर बीजेपी के साथ संबंध विच्छेद की घोषणा कर दिया। उसी दिन उन्होने बीजेपी के 11 मंत्रियों को मंत्री मण्डल से हटाने के लिए राज्यपाल से सिफ़ारिश भी कर दी। मैंने पतन की शुरुआत शब्द का इस्तेमाल इसलिए किया है क्योंकि एक अच्छे भले तथा ढंग से चल रहे सरकार को सिर्फ अपने अहंकारवश  तोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं थी। पर अहंकार मे आदमी को जमीन दीखता कहाँ है?  नितीश को लगता था जनता मूर्ख है, वह उससे एलाएन्स क्यों तोड़ लिया इसका जबाब नहीं मांगेगी। उन्हें यह भी लगता था कि उनकी विकास पुरुष की जो छवि बनी है उसके कारण लोक सभा के चुनाव मे बिहार मे उनकी बहुत बड़ी जीत होगी और वे अभी भी अपनी प्रधान मंत्री बनने की महत्वाकांक्षी योजना को मूर्त रूप दे सकते हैं। पर ये पब्लिक है, सब जानती है। लोकसभा के चुनाव मे जनता ने ऐसा जोरदार  चपत लगाया कि उसकी गूंज कई महीनों तक सुनाई देती रही। बिहार मे लोकसभा की कुल 40 सीटों मे से जेडीयू को मात्र 2 सीटें ही मिल सकी, दूसरी ओर मोदी के नेतृत्व मे चुनाव लड़ रही एनडीए गठबंधन कुल 31 सीटें प्राप्त करने मे सफल रही। लोकसभा के इस परिणाम ने नितीश को अंदर से हिला कर रख दिया। पतन का ये पहला दृश्य था। नितीश को अब एहशास हो चुका था  कि यदि यही स्थिति रही तो 2015 मे होने वाले बिहार चुनाव मे मुख्य मंत्री की कुर्सी बचानी भी मुसकिल होगी। चाटुकारों ने फिर समझाया कि यदि जेडीयू एवं लालू नीत आरजेडी के 2014 लोकसभा के चुनाव मे प्राप्त वोट शेयर को मिला दिया जाए तो अभी भी बीजेपी नीत गठबंधन को मात दिया जा सकता है। मरता क्या न करता। नितीश यह भी भूल गए कि जिस लालू के जंगल राज के खात्मा के लिए  उन्होने बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, आज उसी जंगल राज के प्रतीक लालू से हाथ मिलाना कितना अनैतिक है। पर अपने अहंकार के कारण नितीश जिस निचले मुकाम पर पहुँच चुके हैं, उनके सामने लालू की बैशाखी के अलावा अब और कोई चारा भी नहीं है। अब 2015 का चुनाव ही यह तय करेगा कि जनता इस अनैतिक गठबंधन को स्वीकार करती भी है या नहीं। 

पर इस पूरे प्रकरण मे तथा खासकर 2015 के चुनाव प्रकरण मे भी एक प्रश्न जो अभी तक अनुत्तरित है वह है , क्या वास्तविकता मे नितीश एक विकास पुरुष हैं, क्या वास्तविकता मे उनमे इतनी क्षमता है कि वे लालू के कंधे पर बैठ कर भी  बिहार का विकास ठीक उसी तरह कर सकते हैं जैसा एनडीए के साथ मिलकर किया था। विकास पुरुष की उनकी छवि वास्तविकता मे एक सच्चाई है या मात्र भ्रम । इस तथ्य को समझने के लिए यह आवश्यक है की कि उनके दूसरे पड़ाव अर्थात 16 जून 2013 को जब उन्होने बीजेपी से अलग होने का ऐलान किया था, तब से लेकर 2015 के अभी तक के कार्यकलापों का लेखा जोखा लिया जाए। किसी सरकार के कार्य निष्पादन (Performance)  को नापने का यूं तो ढेर सारे पैमाने हैं। पर मैं यहाँ मात्र दो ही पैमाना ले रहा हूँ, पहला - जीडीपी ग्रोथ रेट, जो किसी भी सरकार के आर्थिक सफलता को नापने का सबसे बड़ा माध्यम है, और दूसरा- क्राइम रेट अर्थात अपराध दर, जो राज्य मे शांति व्यवस्था की स्थिति क्या है, इसे नापने का सबसे बड़ा पैमाना है। और मुझे यह कहने मे तनिक भी हिचक नहीं है कि इन दोनों ही पैमाने पर नितीश बुरी तरह असफल नजर आते हैं।                                             



सबसे पहले जीडीपी विकास दर को लें। 2012-13 का आर्थिक वर्ष जब तक नितीश बीजेपी के साथ थे, तब तक का यदि पिछले 7 वर्षों का एनडीए सरकार का औसत विकास दर देखा जाए, तो यह विकास दर था 12% , जो एक बहुत ही उचे दर्जे के आर्थिक मोर्चे पर सफलता को दर्शाता है। 2012-13 जिस वर्ष नितीश ने बीजेपी से तलाक लिया उस वर्ष तो विकास दर पिछले 7 वर्षों के औसत से भी ऊपर 14.5% था। इस बात का जिक्र सुशील मोदी ने तो किया ही  है, बिजनेस स्टैंडर्ड ने भी इस आंकड़े को प्रकाशित किया था। परंतु ऐसा क्या हुआ कि बीजेपी के गठबंधन से हटते ही जीडीपी विकास दर मे गिरावट आनी  शुरू हो गई तथा 2014-15 का जो आंकड़ा उपलब्ध है, उससे तो पता चलता है कि वर्तमान विकास दर पिछले 7 वर्षों के औसत विकास दर से भी बहुत ज्यादा नीचे गिर चुका है। 2014-15 का  विकास दर 2012-13 के विकास दर 14.5 से गिरकर मात्र  9% पर आ चुका है। यदि कितने % की  गिरावट आई, इस बात का आकलन किया जाए तो 2012-13 की तुलना मे  यह गिरावट लगभग 40% बैठता है। अर्थात मात्र 2वर्षों मे आर्थिक विकास दर मे 40%  की गिरावट आई है। क्या इसके बाद भी आप नितीश को विकास पुरुष कह सकते हैं ? 
अब आते हैं क्राइम रेट अर्थात अपराध दर पर। अपराध दर की छान-बीन के लिए मैंने बिहार पुलिस द्वारा प्रकाशित आंकड़ों का ही सहारा लिया है। बीजेपी के सरकार से हटने के बाद अपहरण जो कि जंगल राज के समय सबसे तेज गति से चलने वाला धंधा था, उसकी क्या स्थिति है ? उसमे कमी आई है या तेजी, राज्य मे दंगों की क्या स्थिति है, और औरतें कितनी सुरक्षित हैं- मैंने इन तीन चीजों के माध्यम से बिहार मे कानून व्यवस्था की स्थिति को जानने का प्रयास किया है। परिणाम आपके सामने है। 2012-13 मे अपहरण की  घटनाएँ जिसकी संख्या 4765 थी,  वह 2014-15 मे बढ़ कर 6,889 पहुँच गई, अर्थात 2 वर्षों मे इसकी संख्या मे 45% की वृद्धि हुई है । क्या अर्थ है इसका ?  मात्र 2 वर्षों मे अपहरण की घटनाओं मे 45% की विशाल वृद्धि यह आने वाले दिनों का स्पष्ट संकेत है, कि बस अब फिर से दुबारा जंगल राज लौटने ही वाला है । जंगल राज के लौटने की धमक अपहरणों की संख्या मे 45% की इस वृद्धि मे स्पष्ट देखा जा सकता है।
दूसरा पैमाना दंगों की संख्या मे आई वृद्धि से संबन्धित है । यहाँ भी स्थिति कोई ज्यादा भिन्न नहीं है। 2012-13 मे 10,914 दंगे हुए थे जो 2014-15 मे बढ़कर 13,517 पहुँच गया। अर्थात लगभग 24% की वृद्धि, जो आने वाले समय मे एक भयावह स्थिति की ओर संकेत कर रहा है। 
तीसरा पैमाना था रेप अर्थात बलात्कार की संख्या मे आई वृद्धि या गिरावट से। यहाँ भी स्थिति कोई बहुत ज्यादा भयावह नहीं तो अच्छी भी नहीं कह सकते। 2012-13 मे बलात्कार की संख्या थी 920, जो 2014-15 मे बढ़कर हो गई 1,088 अर्थात लगभग 18% की वृद्धि। स्पष्ट है, अपरोधों पर जितना नियंत्रण बीजेपी के साथ गठबंधन के समय था , वैसा नियंत्रण अब नहीं रहा। लालू के साथ गठबंधन का असर अपहरण की संख्या मे आए लगभग 45% से भी ज्यादा की वृद्धि मे स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।  
निष्कर्ष यह कि नितीश का विकास का दावा मात्र एक ढ़ोल के सिवा और कुछ नहीं। यदि सचमुच विकास करने की क्षमता होती तो विकास दर इस तरह 14.5% के उच्च शिखर से लुढ़क कर 9% पर नहीं आ जाता। मात्र दो वर्षों मे इस  विकास दर का, पिछले 7 वर्षों के औसत विकास दर जो 12% था, उससे भी इतना ज्यादा नीचे आ जाना इस बात की पुष्टी करता है कि नितीश को मिला विकास पुरुष का क्रेडिट वास्तविकता मे सुशील मोदी को दिया जाना चाहिए था न कि नीतीश को।  
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सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

हेंह, हेंह मोदी ने आखिर किया क्या है ? (पार्ट-2) Achievements Of Modi Govt. in 16 Months

                                                                                                                     ( गतांक से आगे )                                    देश में गरीबों के लिए पहली बार :                                                                        कवच, कौशल और कर्ज तीनों एक साथ        


पिछले अंक मे आपने पढ़ा मोदी की कुछ असाधारण एवं ऐतिहासिक उपलब्धियां, इस अंक मे प्रस्तुत है मोदी द्वारा गरीबों एवं निम्न आय वर्ग के लोगों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने एवं उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए उठाए गए कुछ कदम। मोदी ने गरीब तथा निम्न आय वर्ग के लोगों को तीन तरह का सामाजिक सुरक्षा कवच प्रदान किया है। दो बीमा योजनाएँ एवं एक पेंशन योजना। इसी तरह उन्हें आत्म निर्भर बनाने के लिए मोदीने दो अति महत्व पूर्ण हथियार उनके हाथों मे सौंपा है । प्रथम, प्रधान मंत्री कौशल विकाश एवं स्किल इंडिया योजना एवं द्वितीय, गरीबों को बिना किसी जमानत या गिरवी रक्खे कर्ज देने के लिए, मुद्रा बैंक योजना। इस अंक में प्रस्तुत है इन्हीं योजनाओं पर एक सरसरी नजर।    

2॰ मोदी की अति विशिष्ट योजनाएँ एवं उपलब्धियां :
भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ की किसी प्रधान मंत्री ने गरीबों को भी पेन्सन मिलना चाहिए, उनके भी जीवन का बीमा होना चाहिए ताकि असमय मृत्यु की स्थिति में उनके परिवार को कुछ सहारा मिल सके एवं उन्हें भी अचानक कोई दुर्घटना हो जाए जिसमे उसकी मृत्यु हो जाती है या अपंग हो जाए, तो उसे भी कुछ आर्थिक सुरक्षा मिलनी चाहिये, ऐसा  न सिर्फ सोंचा बल्कि इस सोंच को वास्तविकता के धरातल पर उतारा   भी । इस तरह की बीमा योजनाएँ व्यापारिक रूप से पहले से ही कई संस्थाओं जैसे भारतीय जीवन बीमा निगम एवं अन्य सरकारी, गैर सरकारी एजेंसियां चला तो रही हैं, पर इनमें प्रीमियम का दर इतना ज्यादा है कि ज्यातर गरीब, यहाँ तक की मध्य वर्ग का भी एक बहुत बड़ा तबका इसका लाभ नहीं उठा पाता। मोदी सरकार ने इसी वर्ग को लक्ष्य मानकर गरीबों तथा आर्थिक रूप से पिछडों को भी सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा कवच देने के लिए निम्न लिखित तीन योजनाओं का शुभारंभ किया है। इन 3 योजनाओं मे पहली, एक आम आदमी को मात्र 330 रु॰ सालाना मे जीवन बीमा प्रदान करती है, दूसरी, मात्र 12 रु॰ सालाना मे दुर्घटना बीमा प्रदान करती है और तीसरी, एक आम नागरिक को भी उसके 60 वें वर्ष से पेंशन प्रदान करती है।  कहना न होगा, शुरू होते ही ये तीनों योजनाएँ जबर्दस्त सफलता हासिल कर रही हैं। 

1. प्रधान मंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना : 

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इस योजना के तहत कोई भी व्यक्ति जिसकी आयु 18 से 50 वर्ष के बीच है, मात्र 330 रुपये प्रति वर्ष के भुगतान पर 2 लाख रुपये का जीवन बीमा प्राप्त कर सकता है। अर्थात बीमा कराये गए अवधि के बीच मे यदि उसकी मृत्यु होती है, तो उसके परिवार को 2 लाख रुपये प्राप्त होंगे। परंतु इस योजना का लाभ उठाने के लिए शर्त यह है कि आपका जन धन योजना के तहत बैंक में खाता होना चाहिए और आपके खाते से प्रीमियम की रकम स्वत: काट ली जाए इसकी सहमति देनी होगी। इसका मतलब यह हुआ की जन धन योजना के तहत खोले गए बैंक खाते को आप जीरो बैलेंस पर नहीं रख पाएंगे। उस खाते को चालू रखना जरूरी है। कहना न होगा कि इतने कम रकम में गरीबों तथा आर्थिक रूप से पिछड़ों को जीवन सुरक्षा प्राप्त कराना मोदी सरकार का एक उललखनीय ऐतिहासिक कदम है।   
                                        
2॰ प्रधान मंत्री सुरक्षा बीमा योजना :

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एक मजदूर, जो संगठित क्षेत्र के किसी बड़े उद्योग या कल कारखाने में काम करता है, यदि उसकी दुर्घटना में मौत हो जाए या वह अपंग हो जाए तो उसे कल कारखाने से संबन्धित सुरक्षा अधिनियमों के तहत कई तरह के लाभ एवं क्षति पूर्ति प्राप्त करने का हक है, पर असंगठित क्षेत्र का एक गरीब मजदूर जो किसी बिल्डर का ऊंचा मकान बना रहा है, यदि गिरकर उसकी मौत हो जाए या अपाहिज हो जाए तो उसे क्या मिलेगा। कुछ नहीं सिवाय सांत्वना या बहुत हुआ तो कुछ रुपयों की मदद के सिवा। इन्हीं असंगठित क्षेत्र के गरीब मजदूरों को ध्यान में रख कर प्रधान मंत्री सुरक्षा योजना का शुभारंभ किया गया है।
इस योजना के तहत मात्र 12 रुपये सालाना देकर कोई भी व्यक्ति चाहे किसी भी क्षेत्र मे काम करता हो, इस योजना का लाभ उठा सकता है, वशर्ते उसकी उम्र 18 से 70 वर्ष के बीच होनी चाहिए। इस योजना के तहत यदि उस व्यक्ति की मृत्यु किसी दुर्घटना वश हो जाती है या उस दुर्घटना के कारण वह पूरी तरह अपंग एवं काम करने लायक नहीं रह जाता, तो 2 लाख रुपये तथा यदि आंशिक रूप से अपंग हो जाता है तो 1 लाख रुपये की राशि प्रदान की जाती है। कहना न होगा कि गरीबों की सुरक्षा की दृष्टि से यह कितना महत्व पूर्ण कदम है, क्योंकि 12 रुपए की रकम इतनी छोटी रकम है कि एक अत्यधिक गरीब भी इस रकम को आसानी से दे सकता है। 

3. अटल पेन्शन  योजना : 
किसी ने कल्पना किया था कि एक गरीब भी 60 साल के बाद रिटायर होने पर पेंशन प्राप्त कर सकता है। मोदी सरकार ने गरीबों को भी बुढ़ापे में एक सुरक्षा कवच मिले, इस उद्देश्य से अटल बिहारी बाजपेयी जी के नाम पर इस योजना का नामकरण एवं शुभारंभ किया है। इस योजना के तहत कोई भी व्यक्ति जिसकी उम्र 18 से 40 के बीच है, इस योजना का लाभ उठा सकता है, पर शर्त यह है कि (1) वह पहले से ही ऐसे ही किसी सवैधानिक सामाजिक सुरक्षा योजना का सदस्य नहीं होना चाहिए, (2) तथा वह इन्कम टैक्स दाता नहीं है, अर्थात उसकी आय इतनी नहीं है कि वह इन्कम टैक्स दे सके। इस योजना में शामिल होने पर सरकार के तरफ से प्रति वर्ष उस व्यक्ति द्वारा दिये गए अंश दान का 50% या 1000 रुपया जो भी कम होगा,उतनी राशि सरकार द्वारा सहायता के रूप में दी जाएगी। यह सहायता सरकार द्वारा 5 वर्षों तक दी जाएगी , अर्थात 2015-16 से शुरू होकर 2019-20 तक, परंतु यहाँ भी एक शर्त यह है कि यह सहायता उन्हीं लोगों को मिलेगी, जो लोग 2015 दिसंबर तक इस योजना मे सम्मिलित हो चुके होंगे। 
   
                                                                               
                                                                                 
इस योजना के तहत सम्मिलित होने वाले व्यक्ति को जब वह 60 साल का हो जाएगा, तब प्रति माह 1000, 2000, 3000, 4000 या 5000 तक की रकम लाभार्थी को पेंशन के रूप में प्राप्त होगा। यह उस व्यक्ति की आर्थिक क्षमता पर निर्भर है कि वह कितने का पेंशन लेना चाहता है ,क्योकि ज्यादा पेंशन लेने के लिए ज्यादा रकम देना होगा, पर राहत की बात यह है कि सरकार हरेक वर्ष 50% या 1000 तक की सहायता 5 वर्षों तक करती रहेगी। इसके साथ ही अंशदान की रकम इस बात पर भी निर्भर होगी कि वह व्यक्ति किस उम्र में इस योजना मे शामिल हो रहा है। उदाहरण के लिए यदि एक 35 वर्ष का व्यक्ति प्रति माह 5000 रुपये पेंशन के रूप में प्राप्त करना चाहता है तो उसे 902 रु॰ प्रति वर्ष अंशदान के रूप मे 25 वर्षों तक देना होगा। पर यदि वह 18 वर्ष की उम्र मे ही इस योजना मे सम्मिलित होता है तो उसे मात्र 219 रु॰ प्रति माह देने होंगे पर यह रकम उसे 42 वर्षों तक देना होगा। । पेंशन की रकम लाभार्थी को अवश्य मिलेगी, इसकी गारंटी सरकार लेती है। 
उपरोक्त तीनों ही योजनाएँ सुपर डुपर हिट रही हैं तथा लोगों मे इन योजनाओं का लाभ उठाने की होड लग गई है। सितंबर 2015 तक के उपलब्ध डाटा अनुसार अबतक प्रधान मंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना मे 2 करोड़ 83 लाख, प्रधान मंत्री सुरक्षा बीमा योजना मे 8 करोड़ 68 लाख एवं अटल पेंशन योजना मे 7लाख 80 हजार लोग शामिल हो चुके हैं। इन तीनों योजनाओं मे सम्मिलित लोगों की कुल संख्या सितंबर 2015 तक 11 करोड़ 58 लाख तक पहुँच चुकी थी।  

4॰  प्रधान मंत्री कौशल विकास योजना एवं स्किल इंडिया योजना :   
2014 के एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में करीब 37 करोड़ लोगों की उम्र 10 से 24 वर्ष के बीच है और जैसा कि मोदी बार बार अपने भाषणों मे कहते रहे हैं देश मे पूरी जनसंख्या का 65% युवा वर्ग का है। इतनी बड़ी युवा शक्ति को यदि अच्छी तरह विभिन्न उद्योग, व्यापार एवं तकनीक से संबन्धित ज्ञान एवं कौशल की शिक्षा दी जाए, उनमे छिपे हुनर का विकास किया जाए, तो इस योजना से न सिर्फ विभिन्न उद्योगों को उनकी आवश्यकता अनुसार यथेष्ट मात्रा मे कारीगर मिल जाएंगे बल्कि बड़ी मात्र में बेरोजगारी दूर करने में भी यह मिल का पत्थर साबित होगा। इसी उद्देश्य को ध्यान मे रख कर दोनों योजनाएँ शुरू की गई हैं। 
प्रधान मंत्री कौशल विकाश योजना के तहत ऐसे युवक जो कक्षा 10 या 12 मे असफल हो गए, आगे नहीं पढ़ सके या जो निम्न आय वर्ग से आते हैं, ऐसे 24 लाख युवकों को विभिन्न प्रकार के कौशल या हुनर में प्रशिक्षित करने की योजना है।  ट्रेनिंग समाप्त होने के बाद ऐसे युवकों की परीक्षा भी ली जाएगी एवं उस परीक्षा मे प्राप्त परिणाम अनुसार योग्यता प्राप्ती का सर्टिफिकेट भी दिया जाएगा, ताकि उस सर्टिफिकेट के आधार पर वह नौजवान रोजगार प्राप्त कर सके। इसके अलावा असाधरन योग्यता प्रदर्शित करने वाले युवकों को 8000 रुपए की पुरस्कार राशि भी दी जाती है। 

                              

स्किल इंडिया का उद्देश्य एवं कार्यक्रम का पैमाना दोनों प्रधान मंत्री कौशल विकास योजना की तूलना मे बहुत बड़ा है। इस योजना का लक्ष्य 2020 तक भारत के एक एक गाँव तथा शहर तक पहुंचाना तथा इनमें रह रहे कम से कम 50 करोड़ युवाओं को अंतर्राष्ट्रीय स्तर का कौशल प्रशिक्षण प्रदान करना है, ताकि वे न सिर्फ भारत बल्कि जर्मनी, जापान, चीन, अमेरिका तथा विश्व के अन्य देशों के तकनीकी क्षमता से सम्पन्न कारीगरों की मांग की भी आपूर्ति कर सकें। इस योजना के तहत दिया जाने वाला कौशल प्रशिक्षण न सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय स्तर बल्कि नवीनता की खोज आधारित भी होगा। प्रशिक्षण कोर्स बनाते समय इस बात का विशेष ध्यान रक्खा गया है कि देश में तथा विदेशों मे भी किस तरह के कारीगरों की ज्यादा मांग है। प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद चाहें तो ये युवा अपने खुद का कारख़ाना या अन्य व्यापार भी शुरू कर सकेंगे क्योकि इन्हें एक सफल उद्द्यमी बनने के गूढ रहस्य की भी शिक्षा दी जाएगी।  कहना न होगा कि ये दोनों ही योजनाएँ देश मे बेरोजगारों कि बढ़ती संख्या को कम करने मे महत्व पूर्ण भूमिका अदा कारेगी। 

5॰  मुद्रा बैंक  Micro Units Development & Refinance Agency :   
    ( गरीबों को आत्मनिर्भर बनाने का सबसे महत्व पूर्ण ब्रह्मास्त्र )

देश मे यह पहली बार हुआ है कि गरीबों तथा निम्न आय वर्ग के लोगों को आर्थिक सुरक्षा कवच, कौशल प्रशिक्षण तथा कर्ज तीनों एक साथ दिया जा रहा है। कौशल प्राप्त हो जाने के बाद, एक युवा निवेशक यदि अपने खुद का कोई उदद्योग या व्यापार शुरू करना चाहे तो उसे बिना किसी बाधा के बैंकों से कर्ज मिलना जरूरी है। न सिर्फ युवा उद्द्यमी बल्कि देश मे ऐसे करोड़ो करोड़ लोग हैं, जो छोटे छोटे व्यापार या उदद्योग मे लगे हुए हैं,पर लगभग रोज हीं अपने कर्ज की आवश्यकताओं के लिए बैंकों के पास न जाकर, सूदखोर साहूकारों (Money lenders) से बहुत ही ऊंचे व्याज दर पर कर्ज लेकर अपनी आवश्यकता की पूर्ति कर रहे हैं। सब्जी

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बैंचने वाला, ठेला लगाने वाला, गलियों मे फेरि लगाने वाले, चाय का स्टाल चलाने वाले,अपना रिक्शा या ऑटो रिक्शा चलाने वाले, महिलाएं जो सिलाई या बियूटी पार्लर चलना चाहती हैं, ऐसे करोड़ो लोग हैं जिन्हे देश के बैंकिंग प्रणाली से कोई विशेष प्रोत्साहन नहीं मिलता और इसमे जो सबसे बड़ा कारण है वो है - बैंकों द्वारा बिना जमानत के कर्ज न देना। मजबूरन छोटे छोटे धंधों मे लगे ये लोग, साहूकारों से ऊंचे व्याज पर कर्ज मिलने के बावजूद उन्हीं के पास जाने को मजबूर हैं क्योंकि साहूकार उनसे जमानत नहीं मांगते । नतीजा यह होता है कि वो जो भी कमाते हैं, उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा सूदखोरों के पास चला जाता है और उनकी दयनीय स्थिति ज्यों की त्यों बनी रहती है।  मोदी सरकार ने इसी वर्ग की जरूरतों को ध्यान मेँ रख मुद्रा बैंक की स्थापना की है। अंग्रेज़ी मे इस बैंक का नाम है : Micro Units Development & Refinance Agency । अँग्रेजी के इन्हीं शब्दों के प्रथम अक्षर को जोड़ कर नाम पड़ा है - मुद्रा बैंक। 

                                 

यह बैंक देश मे पहले से ही स्थापित सिडबी (small Industries Development Bank of India ) एसआईडीबीआई के सब्सिडियरी के रूप मे काम करेगा। प्रधान मंत्री मोदीजी ने 8 अप्रैल 2015 को इस योजना का  प्रारम्भ 20,000 करोड़ की प्राथमिक पूंजी से किया था। इसकी स्थापना का मूल उद्देश्य है गांवों, सुदूर पिछड़े क्षेत्रों मे रहने वालों तथा निम्न आय वर्ग के ऐसे लोग जो देश की बैंकिंग व्यवस्था के लाभ से वंचित हैं, उन लोगों तक बैंको से मिलने वाली सारी सुविधाएं जैसे,विभिन्न तरह की बीमा योजनाएँ एवं कम व्याज दर पर, बिना किसी स्थायी संपत्ति जमानत में रक्खे, विभिन्न प्रकार के अति लघु उदद्योगों या व्यापार के लिए कर्ज मुहैया कराना । इस योजना के तहत तीन तरह का कर्ज देने की व्यवस्था की गई है। 
1॰ शिशु ऋण     :              50,000 तक की रकम ।
2. किशोर ऋण  :         50,000 से 5 लाख तक की रकम । 
3. तरुण ऋण    :             5 लाख से 10 लाख तक । 
भविष्य में इस योजना के तहत मुद्रा कार्ड देने, क्रेडिट गारंटी एवं क्रेडिट में वृद्धि आदि का भी प्रावधान करने की संभावना है। सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत मार्च 2016 तक 2 करोड़ जरूरतमन्द लोगों को उनके उदद्योग, व्यापार में निवेश के लिए 1.22 करोड़ रुपये कर्ज के रूप मे देने का लक्ष्य है। इस योजना की सफलता के लिए प्रधान मंत्री स्वयं मॉनिटरिंग कर रहे हैं। देश के विभिन्न बैंकों ने अप्रैल से अबतक लगभग 22लाख लोगों को 29,000 करोड़ रुपये के कर्ज की मंजूरी दे चुके हैं तथा इस रकम मे से करीब 9,000 करोड़ रुपये कर्ज लेने वालों के बीच वितरण भी किया जा चुका है। इस योजना की सफलता का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि बहुत बड़ी मात्र मे महिलाएं भी इस योजना का लाभ उठाने के लिए आगे आ रही हैं। कोई ब्यूटी पार्लर के लिए, तो कोई भैस खरीदने के लिए, तो कोई ट्यूशन सेंटर खोलने के लिए, बड़े पैमाने पर महिलाओं को भी इस योजना मे काम शुरू करने की प्रेरणा मिल रही है। इसी तरह अति छोटे छोटे व्यापार मे लगे लोग, जैसे सब्जी बेचने वाले, ठेला पर सामान बेचने वाले, चाय का स्टाल लगाने वाले आदि भी बड़ी मात्रा मेँ इस योजना से लाभान्वित हो रहे हैं। 2013 मे किए गए एक सर्वे के अनुसार देश मे लगभग 5.70 करोड़ ऐसे लघु उद्द्यमी तथा छोटे व्यापारी हैं, जिन्हें बैंकों से ऋण प्राप्त करने मेँ अत्यधिक कठिनाई होती है, क्योंकि बैंक बिना किसी जमानत के कर्ज देना नहीं चाहते। उन्हें डर लगा रहता है कि कहीं दिया गया कर्ज डूब न जाए। मुद्रा बैंक इसी समस्या का समाधान लेकर आया है तथा अब बिना किसी जमानत के ऐसे करोड़ों अति लघु तथा लघु व्यापारियों, उद्द्यमियों को कर्ज मिलना  आसान हो गया है, जो पहले बैंकों से कर्ज न मिल पाने के कारण सूदखोरों तथा  साहूकारों पर आश्रित थे।
उपरोक्त पांचों योजनाओं को यदि संयुक्त रूप से देखा जाए तो इसमे कोई शक नहीं कि आने वाले भविष्य में ये भारत का चेहरा बदलने वाली योजनाएँ सिद्ध होंगी । ये योजनाएं भारत से गरीबी मिटाने, बड़ी मात्रा मे गरीबों को आत्म निर्भर बनाने एवं देश से बेरोजगारी हटाने में मील का पत्थर साबित होंगी। 
                                                                                                 
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सोमवार, 28 सितंबर 2015

हेंह, हेंह, आखिर मोदी ने किया क्या है ? (पार्ट-1) Achievements Of Modi Govt. in 16 Months





मोदी ने अभी तक जो भी achieve किया है,उन उपलब्धियों की महत्ता के अनुसार मैंने उन्हें दो श्रेणीयों में बाँट दिया है। 1॰ असाधारण एवं ऐतिहासिक उपलब्धियां 2. अति विशिष्ट उपलब्धियां। प्रस्तुत है मोदी की दोनों हीं तरह कि उपलब्धियां दो अंकों में । इस अंक में प्रस्तुत है मोदी की -  

1॰ असाधारण एवं ऐतिहासिक उपलब्धियां

1॰  बंगलादेश के साथ 40 वर्षों से भी ज्यादा समय से आधार में लटका सीमा अदला बदली सम्झौता

मात्र इस एक सम्झौते के कारण मोदी को भारत - बंगला देश के इतिहास में हमेशा याद रक्खा जाएगा। 
 
India, Bangladesh Sign Historic Deal That Ends Border Disputes Between the 2 Nations

इस एक समझौते ने न सिर्फ बंगला देश के साथ रिश्तों मे एक नई गरम जोशी एवं ठहराव पैदा किया है, बल्कि भारत, भूटान, बंगला देश एवं म्यांमार कॉरीडोर का मार्ग भी प्रशश्त कर दिया है । इस समझौते की महत्ता न सिर्फ आर्थिक बल्कि भारत की सुरक्षा के दृष्टि से भी अमूल्य है। पिछले 40 वर्षों से बॉर्डर की यह समस्या लंबित थी। मनमोहन सरकार ने भी इस समस्या का हल निकालने तथा समझौते को अंतिम रूप देने का प्रयास किया था, पर उन्हें इस में सफलता नहीं मिली। मोदी ने न सिर्फ ममता बनर्जी को अपने विश्वास में लिया बल्कि समझौते पर हस्ताक्षर समारोह के लिए अपने साथ बंगला देश ले जाने में भी सफल रहे।  

2॰  कोयला खदानों के आबंटन से 4 लाख करोड़ से भी ज्यादा का राजस्व संग्रह  : 
याद करें मनमोहन सिंह का सोनिया अधशाशित UPA 2 का काल खंड । भारत के सारे कोयला के खदानों को मुफ्त मे सोनिया तथा कांग्रेस के चहेतों के बीच बाँट दिया गया। सरकार के खजाने में एक पैसा नहीं आया।

 

अरबों रुपये की घूसख़ोरी हुई पर कांग्रेस कहती रही कोई घपला नहीं हुआ है। मोदी सरकार के आने के बाद पूरी खदान आवंटन की प्रक्रिया को बदला गया एवं इसे नीलामी प्रक्रिया से जोड़ा गया। मनमोहन सरकार को भी यह प्रक्रिया सुझाया गया था पर सोनिया के दबाव मे उसे नही लागू किया गया और बिना कोई तार्किक प्रक्रिया अपनाए अपने चहेतों मे सारा खदान बाँट दिया गया। मैं इसे मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक मानता हूँ। मात्र 67 खदानों की नीलामी से मोदी सरकार ने लगभग 4 लाख करोड़ से भी ज्यादा की रकम जुटा लिया, जबकि अभी भी कुछ खदान सरकार के पास नीलामी के लिए बाँकी है। भारत को जहा एक पैसा भी इन खदानों से नहीं मिल रहा था, वहीं मोदी द्वारा 4 लाख करोड़, जो किसी भी पैमाने पर एक बहुत बहुत बड़ी (huge) रकम है, इकट्ठा कर लेना, न सिर्फ इस सरकार की ईमानदारी का सबसे बड़ा प्रमाण है, बल्कि एक असाधारण उपलब्धि भी है।  

3॰ 2 जी तथा अन्य स्पेक्ट्रम की नीलामी से 1लाख 9 हजार 874 करोड़ का राजस्व संग्रह : 
याद करें कपिल सिब्बल का 2जी घोटाला के विषय मे शून्य लॉस (0 loss) वाला वयान। पहले आओ पहले पाओ के सिद्धान्त की आड़ में मनमोहन सरकार ने सारे 2जी स्पेक्ट्रम अपने चहेतों के बीच औने पौने दाम पर आवंटित किया था। करोड़ो करोड़ के घूस का लेन देन हुआ। सोनिया निर्देशित मनमोहन सिंह की कठपुतली सरकार कहती रही कोई लॉस नहीं हुआ है। पर बाद में इसी कारण ए राजा एवं कई अन्य नेताओं को जेल भी जाना पड़ा। अभी भी केश चल ही रहा है । 
                     
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मोदी की नई सरकार आई और इसने उन्हीं स्पेक्ट्रमों की नीलामी कर 1,09,874 करोड़ रुपया जुटाया जो कोयला की तरह ही एक असाधारण रूप से बड़ी रकम है। इस सरकार ने दिखाया कि कपिल सिब्बल जैसे भ्रष्ट नेता कितना बड़ा झूठ बोल रहे थे। सरकार यदि ईमानदार हो तो क्या हो सकता है, मोदी सरकार की उपरोक्त दोनों उपलब्धियां इसी का उदाहरण है. 

4॰ प्रधान मंत्री जन धन योजना : गिनीज़ वर्ल्ड रेकर्ड 
गरीबों को बैंकिंग नेट वर्क से जोड़ने की इस अद्भुत योजना का आज पूरी दुनिया कायल है। पिछले वर्ष 15 अगस्त को इस योजना का ऐलान मोदी ने लाल किले से किया था । मात्र 5 महीने में ही कुल 11करोड़ 50 लाख एकाउंट खोले गए जो एक वर्ल्ड रेकर्ड है, जिसे गिनीज वालों ने भी अपने वर्ल्ड रेकर्ड में दर्ज किया है। इस योजना के तहत अगस्त 2015 तक18 करोड़ 34 लाख लोगों का खाता खुल चुका है एवं करीब 24 हजार 72 करोड़ रुपया अगस्त तक एवं 32000 करोड़ रुपये सितंबर तक लोगों ने इन खातों मे जमा कराया है। न सिर्फ इतनी बड़ी संख्या में गरीबों को बैंक के नेट वर्क से जोड़ने बल्कि इतनी बड़ी रकम बैंक खातों मे गरीबों द्वारा जमा कराया जाना, दोनों ही भारत के इतिहास में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। अब सरकार द्वारा गरीबों के उत्थान के लिए चलाए जाने वाले किसी भी योजना का लाभ सरकार सीधे गरीबों के खाते में पहुँचा सकती है। पहले दिल्ली से चले एक रूपया में से,एक अध्ययन के अनुसार, सिर्फ 15 पैसा गरीबों तक पहुंचता था, पर अब सौ का सौ प्रतिशत रकम गरीबों तक पहुँचने का मार्ग प्रशश्त हो गया है।
                             
                                                   
 
इन खातों से गैस  सिलिन्डर पर दी जाने वाली सब्सिडी एवं अन्य योजनाओं का लाभ भी सीधे  गरीबों के खाते मे पहुँच रहा है । पहले के सिस्टम मे गरीबों का पैसा बीच मे ही बिचौलिये खा जाते  थे, पर अब नहीं। एक गणना के अनुसार इस योजना में पूर्व के मनमोहन सरकार के समय हो रहे भ्रष्टाचार के कारण लगभग 18000 करोड़ रुपये की गैस सब्सिडी जिसे भारत सरकार प्रत्येक सिलिन्डर पर देती है, वह बीच मे ही बिचौलिये खा जाते थे। पर आधार एवं जन धन बैंक एकाउंट के माध्यम से मोदी सरकार इस 18000 करोड़ के लूट को रोकने में सफल हुई है। सबसे बड़ी बात ये कि सरकार कि अन्य योजनाओं का लाभ भी अब गरीब सीधे उठा सकेंगे । सरकार एवं गरीबों के बीच जन धन बैंक एकाउंट के माध्यम से सीधा संपर्क स्थापित हो जाने के कारण गरीबी उन्मूलन एवं उन्हें स्वावलंबी बनाने की बहुत सारी सरकारी योजनाओं को कारगर ढंग से लागू करना अब आसान हो गया है। आने वाले समय मे यह एक गेम चेंजर योजना साबित होगी।

5॰ विदेशों में भारत की नई पहचान : सबसे तेज गति से विकास की ओर बढ़ता, विश्वास से लबालब, 
एक अत्यन्त शक्तिशाली, दूर द्रष्टा एवं शुद्ध भारतीय नेतृत्व मे नई ऊंचाइयों को छूता भारत : 
ये मोदी का ही कमाल है कि मात्र 16 महीने में भारत की छवि जो एक निकम्मी, कोई भी महत्वपूर्ण निर्णय लेने में अक्षम, भ्रष्टाचार की जननी, देश की रक्षा एवं विदेश नीति, दोनों मे बुरी तरह असफल, आर्थिक सुधारों को गति देने में नाकाम, दिन प्रति दिन सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती महंगाई (2013 में 10.92) पर लगाम लगाने में बुरी तरह विफल, लगातार गिरते GDP ग्रोथ रेट (8.4 से घट कर 4॰7) को रोकने में असफल अर्थात पूरी दुनिया में एक (Failed Nation) असफल राष्ट्र की जो छवि बन गई थी, उसे बदलने मे कामयाब हुए हैं। यह अपने आप में एक असाधारण उपलब्धि है क्योंकि किसी देश की छवि मात्र एक या दो उपलब्धियों के आधार पर नहीं बदलती। बल्कि अर्थ व्यवस्था के सारे प्रचलित मान दण्ड चुस्त दुरुस्त होने चाहिए। मात्र 16 महीनों मे मोदी ने भारतीय अर्थ व्यवस्था को नया आयाम दिया है। आज महंगाई दर 10.92 से घट कर जुलाई 2015 तक के डाटा अनुसार 4.37 पर आ चुका है और लगातार घट रहा है। थोक महंगाई दर तो 2015 जुलाई तक के डाटा अनुसार गिरकर - 4.05 तक पहुँच चुका है। माइनस में थोक सूचकांक का पहुँचना अपने आप मे एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। जहां तक जीडीपी ग्रोथ रेट का प्रश्न है, आज दुनिया की लगभग सभी रेटिंग एजेंसियां भारत को सबसे तेज गति से बढ्ने वाली अर्थ व्यवस्था मान रही हैं। वर्ल्ड बैंक के अनुमान अनुसार 2015-16 में भारत का जीडीपी ग्रोथ रेट 7.5 से 8% तक रहने का अनुमान है जो चीन के ग्रोथ रेट से भी ज्यादा है।


प्रशासन एवं अर्थ व्यवस्था के अन्य माप दंडों पर भी इस सरकार ने कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं। विदेश नीति में लगभग सभी पडोसी देशों के साथ, सिर्फ पाकिस्तान को छोडकर, फिर से एक नए विश्वास एवं सहयोग की स्थापना, दुनिया के लगभग सभी समृद्ध एवं शक्तिशाली देशों के साथ भारत में पूंजी निवेश के लिए सम्झौता,यहाँ तक की संयुक्त अरब अमीरात जैसे मुस्लिम देश जिन्हें पाकिस्तान के साथ ज्यादा नजदीक समझा जाता था,उनके साथ भी भारत में एक बहुत ही बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश का सम्झौता, इतना ही नहीं बल्कि आतंकवाद के खिलाफ भी मिलकर लड़ने तथा एक दूसरे को सहायता करने का सम्झौता, भारत की कूटनीति एवं विदेश नीति की ऐतिहासिक सफलताओं में से एक है। दुनिया आज भारत की ओर फिर से देख रहा है। विश्व की लगभग सारी बड़ी कंपनियाँ जो पिछले साल तक भारत को एक असफल देश मान चुकी थीं, आज पूंजी निवेश के लिए कतार में खड़ी हैं। ये है मात्र 16 महीने में मोदी का जादू ।  
( मोदी की अन्य विशिष्ट उपलब्धियां अगले अंक में .... )
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