विश्लेषण की दृष्टि से देखें तो नितीश की राजनीतिक यात्रा के दो महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। पहला, जब वर्ष 2000 मे बीजेपी ने राज्य मे जेडीयू तथा समता पार्टी (21+34=55) दोनों के कुल सीटों से ज्यादा सीटें (67) पाने के बावजूद नितीश को बिहार के मुख्य मंत्री के रूप मे प्रोजेक्ट किया। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि उस समय के बीजेपी के केंद्रीय नेताओं ने वास्तविकता मे केंद्र मे सत्ता पाने के लोभ मे राज्य के हितों की अनदेखी कर दी, वरना क्या कारण था कि राज्य मे जेडीयू एवं समता दोनों से संयुक्त रूप से भी बड़ी पार्टी होने तथा ज्यादा सीटें जीतने के वावजूद बीजेपी ने अपना मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट क्यों नहीं किया। नितीश को मुख्य मंत्री के रूप मे प्रोजेक्ट करने वालों मे बीजेपी के लाल कृष्ण आडवाणी का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है। पर नितीश को मुख्य मंत्री के रूप मे प्रोजेक्ट करना बीजेपी का कितना गलत निर्णय था इसकी मिसाल तब देखने को मिली, जब 2010 मे एक रैली के लिए पटना मे आए बीजेपी के नेताओं को भोजन पर आने का निमंत्रण देकर, नितीश ने मोदी द्वेष के कारण अपने रावण से भी बड़े अहंकार का परिचय दिया। अंतिम समय मे सारे बुलाये गए बीजेपी नेताओं को भोजन का निमंत्रण रद्द कर दिया गया। मजे की बात यह कि जिन नेताओं का निमंत्रण रद्द किया गया उसमे लाल कृष्ण आडवाणी भी थे, वही आडवाणी जिन्होंने बीजेपी के राज्य इकाई के हितों की बली देकर नितीश को मुख्य मंत्री के रूप मे प्रोजेक्ट किया था। खैर ये तो वर्ष 2010 की बात है, फिर से लौटते है वर्ष 2000 की ओर।
वर्ष 2000 से लेकर वर्ष 2013 तक , जब नितीश ने शायद देश का प्रधान मंत्री बनाने की अति महत्वाकांक्षा तथा अपने हिमालय से भी बड़े अहंकार के कारण बीजेपी से तलाक ले लिया - इस पूरे काल खंड को मैं नितीश का पहला पड़ाव मानता हूँ। नितीश का ये काल खंड शायद उनके जीवन का उत्कृष्टतम काल खंड है, जिसमे उन्होने बीजेपी के सहयोग से नई उचाइयों को छूआ। वर्ष 2000 मे यद्यपि सिर्फ 8 दिन ही पहली बार मुख्य मंत्री रहे, परन्तु एनडीए मे उनका वर्चस्व तथा नेतृत्व स्थापित करने मे ये 8 दिन अति महत्व पूर्ण साबित हुए। 2005 के चुनाव मे पहली बार एनडीए को पूर्ण बहुमत मिला जब बीजेपी को 55 तथा जेडीयू को 88 सीटें प्राप्त हुई तथा नितीश इसके मुख्य मंत्री बने। 2010 के चुनाव मे एनडीए फिर से पूर्ण बहुमत प्राप्त करने मे सफल रही। इस बार तो 2005 के मुक़ाबले और भी ज्यादा सीटें, बीजेपी 91 तथा जेडीयू 115 सीटें प्राप्त करने मे सफल हुई। इसमे कोई शक नहीं कि एनडीए इस काल खंड मे बिहार मे विकास करने मे सफल हुई। 2005-06 मे जिस बिहार का जीडीपी ग्रोथ रेट निगेटिव था, वह अगले 7 वर्षों तक अर्थात 2006-07 से 20013-14 तक, प्रति वर्ष लगभग 12% के ऊंचे एवरेज जीडीपी विकास दर को प्राप्त करने मे सफल रहा। यह सफलता जमीन पर भी लोगों को दिखाई दिया। सबसे बड़ी सफलता थी बिहार से लालू के नेतृत्व वाली जंगल राज की समाप्ती। इस सारी सफलता का श्रेय मिला नितीश को, जबकि वास्तविकता यह थी कि इस सफलता मे बीजेपी का बहुत बड़ा योगदान था। सुशील कुमार मोदी, जो इस मंत्रिमंडल मे वित्त मंत्री के साथ साथ उप मुख्य मंत्री भी थे, बिहार के इस बदलाव मे उनका बहुत बड़ा योगदान था। वित्त की जितनी समझ इन्हे थी तथा जिस सूझ बुझ से इन्होंने बिहार मे बजट तथा विभिन्न विभागों के वित्तीय आवश्यकताओं मे ताल मेल बैठाया, उसने बिहार का चेहरा बदलने मे

एक बड़ी भूमिका निभाई, पर बीजेपी के इस योग्यतम नेता को जितना क्रेडिट मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला। सारा क्रेडिट नितीश ले गए और इन्हें विकास पुरुष का खिताब तक मिल गया। खैर, यहा तक तो फिर भी ठीक था, पर इस विकास पुरुष के खिताब ने नितीश की महत्वाकांक्षा की आग मे घी का काम किया। इस आग मे घी डालने का काम बीजेपी विरोधी मीडिया ने भी खुलकर किया। कुछ अखबारों ने तो नितीश को देश का भावी प्रधान मंत्री तक निरूपित करना शुरू कर दिया। बस यहीं से नितीश के पतन तथा उनके राजनीतिक जीवन के दूसरे पड़ाव की कहानी शुरू होती है।

एक बड़ी भूमिका निभाई, पर बीजेपी के इस योग्यतम नेता को जितना क्रेडिट मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला। सारा क्रेडिट नितीश ले गए और इन्हें विकास पुरुष का खिताब तक मिल गया। खैर, यहा तक तो फिर भी ठीक था, पर इस विकास पुरुष के खिताब ने नितीश की महत्वाकांक्षा की आग मे घी का काम किया। इस आग मे घी डालने का काम बीजेपी विरोधी मीडिया ने भी खुलकर किया। कुछ अखबारों ने तो नितीश को देश का भावी प्रधान मंत्री तक निरूपित करना शुरू कर दिया। बस यहीं से नितीश के पतन तथा उनके राजनीतिक जीवन के दूसरे पड़ाव की कहानी शुरू होती है।
20014 का लोक सभा का चुनाव सिर पर आने ही वाला था। नितीश को लगा कि यदि वो बिहार मे अच्छी संख्या मे सीटें जीतने मे सफल होते हैं, तो लोकसभा चुनाव मे बीजेपी या विरोधी मोर्चा जो भी अच्छी संख्या मे सीटें जीतने मे सफल होंगी उनके सहयोग से वे प्रधान मंत्री बन सकते हैं। उनके चाटुकार उन्हें यह समझने मे सफल रहे कि यदि बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी होकर उभरती है, तब भी वह इतनी सीटें नहीं प्राप्त कर पाएगी कि अपने दम पर सरकार बना सके। ऐसी हालत मे वे बीजेपी से इतर की पार्टियों जैसे ममता, बीजेडी, सीपीएम, कांग्रेस तथा ऐसी ही अन्य पार्टियों को अपने विकास पुरुष की छवि के दम पर सरकार बनाने के लिए सहयोग देने पर राजी कर लेंगे। इसके अलावा एक दूसरा आकलन भी था कि वे बीजेपी के सहयोग से भी अपनी सरकार बना सकते हैं। लाल कृष्ण आडवाणी ने वैसे भी नितीश को बिहार मे बीजेपी की अधिक संख्या होने के बावजूद मुख्य मंत्री बनाने मे सहयोग तो किया ही था। अत: आकलन यह था कि यदि बीजेपी अपने दम पर सरकार नहीं बना सकी, जिसकी सबसे ज्यादा संभावना है, तो वह आडवाणी को फिर से अपने नाम पर समर्थन देने के लिए मना लेंगे। यदि आडवाणी मान गए तो ममता, नवीन पटनायक, मुलायम, डीएमके, एडीएमके आदि पार्टियों से सहयोग प्राप्त करना उतना कठिन नहीं होगा। पर भाग्य को कुछ और ही मंजूर था। नियति के एक थपेरे ने इनके सारे मंसूबों को चकनाचूर कर रख दिया। बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को अपना प्रधान मंत्री उम्मीदवार न सिर्फ चुन लिया बल्कि उसकी घोषणा भी कर दी। नितीश ने अंत अंत तक यह प्रयास किया कि बीजेपी मोदी को न चुन आडवाणी को अपना प्रधान मंत्री का उम्मीदवार तय करे क्योंकि उनके आकलन अनुसार प्रधान मंत्री बनाने मे यदि कोई व्यक्ति उनकी मदद कर सकता था तो वह लाल कृष्ण आडवाणी ही हो सकते थे न कि मोदी।
यहीं से शुरू होती है नितीश के पतन की कहानी। अच्छी भली सरकार चल रही थी, पर आडवाणी को प्रधान मंत्री का उम्मीदवार बनाने एवं मोदी का विरोध करने के लिए नितीश ने बीजेपी के आंतरिक मामलों मे दखल देना शुरू किया। दबाब बनाने के लिए नितीश ने यहाँ तक एलान कर दिया कि बीजेपी यदि मोदी को अपना उम्मीदवार चुनती है तो वह संबंध विच्छेद कर लेगी। पर वे भूल गए कि बीजेपी कोई एक नेता पर आधारित पारिवारिक पार्टी नहीं है। वही हुआ जिसका नितीश को डर था। बीजेपी ने मोदीको चुन लिया, पर तब तक अपने महत्वाकांक्षा तथा अहंकार मे अंधे होकर नितीश इतना ज्यादा आगे बढ़ चुके थे कि वापस लौटने का भी कोई रास्ता नहीं बचा और अंतत: दिनांक 16 जून, 2013 को उन्होने एक प्रैस कान्फ्रेंस कर बीजेपी के साथ संबंध विच्छेद की घोषणा कर दिया। उसी दिन उन्होने बीजेपी के 11 मंत्रियों को मंत्री मण्डल से हटाने के लिए राज्यपाल से सिफ़ारिश भी कर दी। मैंने पतन की शुरुआत शब्द का इस्तेमाल इसलिए किया है क्योंकि एक अच्छे भले तथा ढंग से चल रहे सरकार को सिर्फ अपने अहंकारवश तोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं थी। पर अहंकार मे आदमी को जमीन दीखता कहाँ है? नितीश को लगता था जनता मूर्ख है, वह उससे एलाएन्स क्यों तोड़ लिया इसका जबाब नहीं मांगेगी। उन्हें यह भी लगता था कि उनकी विकास पुरुष की जो छवि बनी है उसके कारण लोक सभा के चुनाव मे बिहार मे उनकी बहुत बड़ी जीत होगी और वे अभी भी अपनी प्रधान मंत्री बनने की महत्वाकांक्षी योजना को मूर्त रूप दे सकते हैं। पर ये पब्लिक है, सब जानती है। लोकसभा के चुनाव मे जनता ने ऐसा जोरदार चपत लगाया कि उसकी गूंज कई महीनों तक सुनाई देती रही। बिहार मे लोकसभा की कुल 40 सीटों मे से जेडीयू को मात्र 2 सीटें ही मिल सकी, दूसरी ओर मोदी के नेतृत्व मे चुनाव लड़ रही एनडीए गठबंधन कुल 31 सीटें प्राप्त करने मे सफल रही। लोकसभा के इस परिणाम ने नितीश को अंदर से हिला कर रख दिया। पतन का ये पहला दृश्य था। नितीश को अब एहशास हो चुका था कि यदि यही स्थिति रही तो 2015 मे होने वाले बिहार चुनाव मे मुख्य मंत्री की कुर्सी बचानी भी मुसकिल होगी। चाटुकारों ने फिर समझाया कि यदि जेडीयू एवं लालू नीत आरजेडी के 2014 लोकसभा के चुनाव मे प्राप्त वोट शेयर को मिला दिया जाए तो अभी भी बीजेपी नीत गठबंधन को मात दिया जा सकता है। मरता क्या न करता। नितीश यह भी भूल गए कि जिस लालू के जंगल राज के खात्मा के लिए उन्होने बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, आज उसी जंगल राज के प्रतीक लालू से हाथ मिलाना कितना अनैतिक है। पर अपने अहंकार के कारण नितीश जिस निचले मुकाम पर पहुँच चुके हैं, उनके सामने लालू की बैशाखी के अलावा अब और कोई चारा भी नहीं है। अब 2015 का चुनाव ही यह तय करेगा कि जनता इस अनैतिक गठबंधन को स्वीकार करती भी है या नहीं।
पर इस पूरे प्रकरण मे तथा खासकर 2015 के चुनाव प्रकरण मे भी एक प्रश्न जो अभी तक अनुत्तरित है वह है , क्या वास्तविकता मे नितीश एक विकास पुरुष हैं, क्या वास्तविकता मे उनमे इतनी क्षमता है कि वे लालू के कंधे पर बैठ कर भी बिहार का विकास ठीक उसी तरह कर सकते हैं जैसा एनडीए के साथ मिलकर किया था। विकास पुरुष की उनकी छवि वास्तविकता मे एक सच्चाई है या मात्र भ्रम । इस तथ्य को समझने के लिए यह आवश्यक है की कि उनके दूसरे पड़ाव अर्थात 16 जून 2013 को जब उन्होने बीजेपी से अलग होने का ऐलान किया था, तब से लेकर 2015 के अभी तक के कार्यकलापों का लेखा जोखा लिया जाए। किसी सरकार के कार्य निष्पादन (Performance) को नापने का यूं तो ढेर सारे पैमाने हैं। पर मैं यहाँ मात्र दो ही पैमाना ले रहा हूँ, पहला - जीडीपी ग्रोथ रेट, जो किसी भी सरकार के आर्थिक सफलता को नापने का सबसे बड़ा माध्यम है, और दूसरा- क्राइम रेट अर्थात अपराध दर, जो राज्य मे शांति व्यवस्था की स्थिति क्या है, इसे नापने का सबसे बड़ा पैमाना है। और मुझे यह कहने मे तनिक भी हिचक नहीं है कि इन दोनों ही पैमाने पर नितीश बुरी तरह असफल नजर आते हैं।
सबसे पहले जीडीपी विकास दर को लें। 2012-13 का आर्थिक वर्ष जब तक नितीश बीजेपी के साथ थे, तब तक का यदि पिछले 7 वर्षों का एनडीए सरकार का औसत विकास दर देखा जाए, तो यह विकास दर था 12% , जो एक बहुत ही उचे दर्जे के आर्थिक मोर्चे पर सफलता को दर्शाता है। 2012-13 जिस वर्ष नितीश ने बीजेपी से तलाक लिया उस वर्ष तो विकास दर पिछले 7 वर्षों के औसत से भी ऊपर 14.5% था। इस बात का जिक्र सुशील मोदी ने तो किया ही है, बिजनेस स्टैंडर्ड ने भी इस आंकड़े को प्रकाशित किया था। परंतु ऐसा क्या हुआ कि बीजेपी के गठबंधन से हटते ही जीडीपी विकास दर मे गिरावट आनी शुरू हो गई तथा 2014-15 का जो आंकड़ा उपलब्ध है, उससे तो पता चलता है कि वर्तमान विकास दर पिछले 7 वर्षों के औसत विकास दर से भी बहुत ज्यादा नीचे गिर चुका है। 2014-15 का विकास दर 2012-13 के विकास दर 14.5 से गिरकर मात्र 9% पर आ चुका है। यदि कितने % की गिरावट आई, इस बात का आकलन किया जाए तो 2012-13 की तुलना मे यह गिरावट लगभग 40% बैठता है। अर्थात मात्र 2वर्षों मे आर्थिक विकास दर मे 40% की गिरावट आई है। क्या इसके बाद भी आप नितीश को विकास पुरुष कह सकते हैं ?
अब आते हैं क्राइम रेट अर्थात अपराध दर पर। अपराध दर की छान-बीन के लिए मैंने बिहार पुलिस द्वारा प्रकाशित आंकड़ों का ही सहारा लिया है। बीजेपी के सरकार से हटने के बाद अपहरण जो कि जंगल राज के समय सबसे तेज गति से चलने वाला धंधा था, उसकी क्या स्थिति है ? उसमे कमी आई है या तेजी, राज्य मे दंगों की क्या स्थिति है, और औरतें कितनी सुरक्षित हैं- मैंने इन तीन चीजों के माध्यम से बिहार मे कानून व्यवस्था की स्थिति को जानने का प्रयास किया है। परिणाम आपके सामने है। 2012-13 मे अपहरण की घटनाएँ जिसकी संख्या 4765 थी, वह 2014-15 मे बढ़ कर 6,889 पहुँच गई, अर्थात 2 वर्षों मे इसकी संख्या मे 45% की वृद्धि हुई है । क्या अर्थ है इसका ? मात्र 2 वर्षों मे अपहरण की घटनाओं मे 45% की विशाल वृद्धि यह आने वाले दिनों का स्पष्ट संकेत है, कि बस अब फिर से दुबारा जंगल राज लौटने ही वाला है । जंगल राज के लौटने की धमक अपहरणों की संख्या मे 45% की इस वृद्धि मे स्पष्ट देखा जा सकता है।
दूसरा पैमाना दंगों की संख्या मे आई वृद्धि से संबन्धित है । यहाँ भी स्थिति कोई ज्यादा भिन्न नहीं है। 2012-13 मे 10,914 दंगे हुए थे जो 2014-15 मे बढ़कर 13,517 पहुँच गया। अर्थात लगभग 24% की वृद्धि, जो आने वाले समय मे एक भयावह स्थिति की ओर संकेत कर रहा है।
तीसरा पैमाना था रेप अर्थात बलात्कार की संख्या मे आई वृद्धि या गिरावट से। यहाँ भी स्थिति कोई बहुत ज्यादा भयावह नहीं तो अच्छी भी नहीं कह सकते। 2012-13 मे बलात्कार की संख्या थी 920, जो 2014-15 मे बढ़कर हो गई 1,088 अर्थात लगभग 18% की वृद्धि। स्पष्ट है, अपरोधों पर जितना नियंत्रण बीजेपी के साथ गठबंधन के समय था , वैसा नियंत्रण अब नहीं रहा। लालू के साथ गठबंधन का असर अपहरण की संख्या मे आए लगभग 45% से भी ज्यादा की वृद्धि मे स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
निष्कर्ष यह कि नितीश का विकास का दावा मात्र एक ढ़ोल के सिवा और कुछ नहीं। यदि सचमुच विकास करने की क्षमता होती तो विकास दर इस तरह 14.5% के उच्च शिखर से लुढ़क कर 9% पर नहीं आ जाता। मात्र दो वर्षों मे इस विकास दर का, पिछले 7 वर्षों के औसत विकास दर जो 12% था, उससे भी इतना ज्यादा नीचे आ जाना इस बात की पुष्टी करता है कि नितीश को मिला विकास पुरुष का क्रेडिट वास्तविकता मे सुशील मोदी को दिया जाना चाहिए था न कि नीतीश को।
****

Nice artcle, Good work
जवाब देंहटाएं